📅 Published on: March 23, 2026
सी एम ओ के आदेश के बाद जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आने पर लोगों में चर्चा का विषय बन गया है कि अब डी एम सिद्धार्थ नगर ही यह असंभव जांच को संभव कर पाएंगे सी एम ओ की अपने ही अधीनस्थों पर नहीं रहा जोर
गुरु जी की कलम से
सिद्धार्थनगर। जनपद के चर्चित मैक्स हॉस्पिटल एण्ड मैटरनिटी सेंटर में 4 मार्च को हुई 25 वर्षीय प्रसूता संगीता की मौत के मामले में न्याय की उम्मीदें स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच टीम ने 17 दिन बीत जाने के बाद भी अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है, जबकि उन्हें महज चार दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश दिया गया था।
जांच में हो रही यह ‘कछुआ चाल’ अब सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और नोडल अधिकारी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
जांच टीम की खामोशी: मिलीभगत या ऊपर से दबाव?
प्रसूता की मौत जैसे संवेदनशील मामले में सीएमओ ने डॉ. एम.एम. त्रिपाठी (नोडल अधिकारी, नैदानिक स्थापना), डॉ. अनूप जायसवाल (MOIC नौगढ़) और डॉ. शाहीन खान (सहायक आचार्य, मेडिकल कॉलेज) की तीन सदस्यीय टीम बनाई थी। हैरानी की बात यह है कि निर्धारित समय सीमा बीतने के हफ़्तों बाद भी टीम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकी है। स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि क्या जांच रिपोर्ट दबाने के पीछे अस्पताल प्रबंधन का रसूख या विभाग के उच्चाधिकारियों का कोई गुप्त दबाव तो नहीं? आखिर नोडल अधिकारी और उनकी टीम दोषियों को बचाने के लिए समय क्यों काट रही है?
परिजनों का गंभीर आरोप: “धमकी और प्रलोभन से दबाया जा रहा मामला”
मृतक संगीता के पिता तुलसीराम ने न्याय के लिए जिलाधिकारी का दरवाजा खटखटाया है। तुलसीराम का आरोप है कि मैक्स हॉस्पिटल के प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के कुछ लोग उन पर केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं। उन्हें प्रलोभन दिया जा रहा है और इनकार करने पर धमकियां मिल रही हैं। पिता ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी का ऑपरेशन बिना मर्जी के ‘जबरिया’ किया गया और हालत बिगड़ने पर उसे बेहतर इलाज देने के बजाय शव को एम्बुलेंस से घर भिजवा दिया गया।
आशा बहू और डॉक्टरों का ‘खूनी’ गठजोड़?
तहरीर के मुताबिक, गांव की आशा बहू शांति देवी ने अस्पताल के डॉक्टरों के साथ मिलकर संगीता को मेडिकल कॉलेज से जबरन मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती कराया। तुलसीराम का दावा है कि डॉक्टरों ने उनकी एक नहीं सुनी और बिना सहमति के ऑपरेशन कर दिया। गलत तरीके से ब्लड चढ़ाने के बाद संगीता की तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई। आरोप है कि जब पीड़ित पिता थाने और सीएमओ ऑफिस पहुंचे, तो उन्हें वहां से भगा दिया गया और शिकायत दर्ज नहीं की गई।
सवालों के घेरे में सीएमओ और नोडल अधिकारी
जब सीएमओ ने 4 दिन में रिपोर्ट मांगी थी, तो 17 दिन बाद भी रिपोर्ट न आने पर नोडल अधिकारी डॉ. एम.एम. त्रिपाठी से स्पष्टीकरण क्यों नहीं मांगा गया?
क्या स्वास्थ्य विभाग प्रसूता की मौत को महज एक आंकड़ा मानकर ठंडे बस्ते में डालना चाहता है?
पीड़ित परिवार को सुरक्षा और न्याय दिलाने के बजाय उन्हें विभाग के चक्कर कटवाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
संगीता की मौत और उसके बाद विभाग की यह लापरवाही साफ इशारा करती है कि जिले में निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम कसने वाला कोई नहीं है।
अब देखना यह है कि जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद क्या दोषियों पर गाज गिरेगी या यह फाइल भी धूल फांकती रह जाएगी।