पर्यावरण और जीवन सुरक्षा के लिए छात्रों ने निकाली साइकिल रैली, नारों से किया जागरूक

Kapilvastupost
*बढ़नी (सिद्धार्थनगर)।*
विकास क्षेत्र बढ़नी के अंतर्गत श्री ब्रजेश्वरी इंटर कॉलेज, घरुआर के छात्र-छात्राओं द्वारा बुधवार को एक भव्य जागरूकता साइकिल रैली निकाली गई। प्रधानाचार्य उदय प्रकाश मौर्य के नेतृत्व में आयोजित इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य समाज में पर्यावरण सुरक्षा, जीवन सुरक्षा, सेहत सुरक्षा और ईंधन सुरक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करना था।
स्कूल से तिरंगा चौराहे तक गूंजे नारे
यह साइकिल यात्रा घरुआर स्थित विद्यालय परिसर से शुरू होकर बढ़नी तिरंगा चौराहे तक पहुंची। यात्रा के दौरान छात्र-छात्राओं का उत्साह देखते ही बनता था। छात्रों ने अपनी साइकिलों पर और हाथों में विभिन्न संदेशों वाली तख्तियां ले रखी थीं।
रैली के दौरान विद्यार्थियों ने समाज को जागरूक करने के लिए कई प्रेरक नारे लगाए, जिनमें मुख्य थे:
*”सांसें हो रही हैं कम, आओ वृक्ष लगाएं हम”*
* *”एक वृक्ष, दस पुत्र समान”*
* *”आओ धरा को हरा-भरा बनाएं”*
* *”धरती को हरा-भरा बनाना है, मिलजुलकर पेड़ लगाना है”*
* *”पेट्रोल-डीजल की फिजूलखर्ची न करें”*
* *”स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत”*
रैली में ये लोग रहे शामिल
इस सराहनीय पहल को सफल बनाने में विद्यालय के शिक्षकों और छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। शिक्षकों में मुकेश निगम, आलोक पांडेय, मोहम्मद इशा, वेद प्रकाश, रमेश यादव और रामानुज सोनकर शामिल रहे। वहीं, छात्र वर्ग से सूरज प्रताप, निखिल अग्रहरि, मनोज विश्वकर्मा और छात्राओं में तारा, रिमझिम, अंजनी, छाया, अंजू व मोहिनी आदि ने साइकिल यात्रा में मुख्य भूमिका निभाई।
**बड़ा सवाल: रैलियों की भीड़ में गुम होती समाज की चेतना!**
नौनिहालों का यह प्रयास निसंदेह सराहनीय है, लेकिन इसके पीछे छिपा एक कड़वा सच हमें सोचने पर मजबूर करता है। आज देश और समाज में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर सालभर में हजारों जागरूकता रैलियां, संगोष्ठियां और बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं। सरकारी विभागों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक, करोड़ों रुपये और असीमित ऊर्जा इन अभियानों में फूंक दी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या समाज वाकई जागरूक हो रहा है?
> हकीकत यह है कि इन रैलियों और आयोजनों का आम जनता और जिम्मेदार नागरिकों पर कोई खास असर दिखाई नहीं देता। रैलियां निकलती हैं, नारे गूंजते हैं और अखबारों की सुर्खियां बनकर खत्म हो जाती हैं। लोग अगले ही पल फिर से वही पुरानी ढर्रे वाली जिंदगी में लौट जाते हैं—वही पानी की बर्बादी, वही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, सड़कों पर फैला कचरा और ईंधन का बेहिसाब दुरुपयोग। जब तक ये आयोजन केवल एक दिन का ‘इवेंट’ बने रहेंगे और समाज अपनी चेतना को ताक पर रखकर इन्हें तमाशे की तरह देखता रहेगा, तब तक बदलाव की उम्मीद बेमानी है। बदलाव नारों से नहीं, नीयत बदलने से आएगा।