📅 Published on: April 18, 2025
गुरुजी की कलम से
शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह न केवल व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की आधारशिला है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। महर्षि अरविंद ने कहा था – “सच्ची शिक्षा वही है जो मानव की अंतर्निहित शक्तियों को पूर्ण रूप से विकसित करे।”
लेकिन सवाल यह है – क्या आज की शिक्षा व्यवस्था इस आदर्श पर खरी उतरती है?
शिक्षा बन चुकी है व्यापार
नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों में दाखिलों की होड़ मच जाती है, और इसके साथ ही शुरू हो जाती है लूट-खसोट। मनमाने ढंग से फीस बढ़ा दी जाती है। किताबें और यूनिफॉर्म उन्हीं दुकानों से खरीदनी पड़ती हैं, जिन्हें स्कूल संचालक खुद तय करते हैं। 25 पन्नों की किताबें 300 रुपये में बिक रही हैं। स्कूल किताबें खुद बेच रहे हैं या ऐसे दुकानों से बिकवा रहे हैं जहाँ से उन्हें मोटा कमीशन मिलता है – 30 से 50% तक।
सीबीएसई मान्यता प्राप्त स्कूलों में तो यह व्यापार और भी खुलेआम चल रहा है। नियमों को ताक पर रखकर प्री-नर्सरी से कक्षा 8 तक अवैध रूप से संचालन हो रहा है।
शिक्षक नहीं, व्यापारी तैयार हो रहे हैं
अभिभावकों की मजबूरी देखिए – सरकारी स्कूलों की दुर्दशा ने उन्हें निजी स्कूलों की ओर मोड़ दिया है, जहां पढ़ाई कम, लूट ज्यादा है। न शिक्षक की योग्यता की जांच होती है, न गुणवत्ता की। कम पढ़े-लिखे, अप्रशिक्षित युवाओं को सस्ते वेतन पर रखकर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है। वहीं निजी प्रकाशकों की किताबें थोपकर स्कूल प्रबंधकों को भारी कमीशन मिलता है।
सरकारी स्कूल की सच्चाई
सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है। गांवों में तो कई जगह शिक्षक महीनों स्कूल नहीं जाते। शिक्षकों के अपने बच्चे भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। जब खुद भरोसा नहीं तो आम जनता क्या उम्मीद करे?
सरकारी शिक्षक सुरक्षित नौकरी की ढाल लेकर निष्क्रिय हो गए हैं, जबकि निजी स्कूलों के शिक्षक कम वेतन और ज्यादा दवाब के बीच काम करते हैं।
रिया की मौत – सिस्टम पर तमाचा
प्रतापगढ़ की 9वीं की छात्रा रिया प्रजापति की आत्महत्या इस व्यवस्था का सबसे भयावह चेहरा है। फीस बकाया होने पर स्कूल ने उसे परीक्षा से बाहर कर दिया, अपमानित किया, और मजबूर कर दिया कि वह मौत को गले लगा ले।
ना कोई मोमबत्ती जली, ना कोई कैंडल मार्च निकला। न कोई धरना हुआ, न कोई ज्ञापन। अगर रिया किसी संगठन, यूनियन, या जातीय समूह से जुड़ी होती तो शायद उसके लिए आंदोलन भी होते।
क्या यही है हमारी नई शिक्षा नीति?
शिक्षा – अधिकार या बोझ?
आज जब हर बच्चा पढ़ने का अधिकार लेकर जन्म लेता है, तब शिक्षा अमीरों की जागीर बन चुकी है। निजी स्कूल अब “शिक्षा केंद्र” नहीं, “कमाई का केंद्र” बन चुके हैं। गरीब बच्चों की आत्मा को रौंदा जा रहा है – कभी किताबों के बोझ से, कभी अपमान से, कभी फीस के आतंक से।
अब क्या करना होगा?
सरकारी स्कूलों में सुधार करना अनिवार्य है।
निजी स्कूलों की मनमानी पर सख्त निगरानी और नियम लागू होने चाहिए।
शिक्षा को व्यापार नहीं, मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए।
रिया जैसे मामलों पर सख्त कार्यवाही और समाजिक संवेदना जरूरी है।