📅 Published on: January 11, 2026
Kapilvastupost
सिद्धार्थनगर। ग्राम पंचायत दईपार में हुआ ₹7.91 लाख का मनरेगा घोटाला केवल एक प्रधान की मनमानी नहीं, बल्कि ब्लॉक प्रशासन की मिलीभगत का जीता-जागता सबूत नजर आ रहा है। लोकपाल द्वारा गबन की पुष्टि किए जाने के बावजूद खंड विकास अधिकारी (BDO) और अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी (APO) की चुप्पी यह बताने के लिए काफी है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।
BDO और APO की निगरानी पर उठे गंभीर सवाल
मनरेगा के नियमों के अनुसार, किसी भी कार्य की आईडी जेनरेट करने से लेकर भुगतान होने तक APO और BDO की सीधी निगरानी होती है। जनता अब यह सवाल पूछ रही है:
* जब एक ही कार्य को दो अलग-अलग आईडी पर दिखाया जा रहा था, तब APO की तकनीकी जांच और लॉग बुक कहां थी?
* बिना भौतिक सत्यापन के BDO ने भुगतान की फाइलों पर हस्ताक्षर कैसे कर दिए?
* क्या यह मान लिया जाए कि अधिकारियों की नाक के नीचे यह सब उनकी ‘मौन सहमति’ से हुआ?
सचिव और अधिकारियों का ‘मजबूत नेक्सस’
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि ग्राम विकास सचिव ने ब्लॉक मुख्यालय पर बैठे उच्चाधिकारियों से सांठगांठ कर रखी है। लोकपाल की जांच रिपोर्ट आने के बाद भी सचिव का अपने पद पर बने रहना और उस पर कोई विभागीय कार्रवाई न होना, इस गठजोड़ (Nexus) की पुष्टि करता है।
शिकायतकर्ता जंगल प्रसाद द्वारा डीएम के सामने मामला रखने के बावजूद, ब्लॉक स्तर के इन अधिकारियों ने अब तक फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल रखा है।
जीरो टॉलरेंस’ या ‘जीरो कार्रवाई’?
जिले में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा कागजी साबित हो रहा है। दईपार मामले में लोकपाल की रिपोर्ट को कूड़ेदान के हवाले कर BDO, APO और सचिव ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें शासन के निर्देशों का कोई खौफ नहीं है।
नियमों की धज्जियां उड़ाकर सरकारी धन की बंदरबांट की गई। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और अधिकारी ही घोटालेबाजों को संरक्षण देने लगें, तो जांच का क्या मतलब?” — स्थानीय ग्रामीण
कार्रवाई की मांग: अब सीधे निशाने पर ब्लॉक प्रशासन
जिले के आला अधिकारियों को अब यह तय करना होगा कि क्या वे इन भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसेंगे या फिर विकास खंड के इन ‘जिम्मेदारों’ को खुली छूट मिलती रहेगी। दईपार के ग्रामीणों ने अब चेतावनी दी है कि यदि सचिव, APO और BDO पर तत्काल कार्रवाई और रिकवरी सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे आगे बड़े आंदोलन कर सकते हैं।