📅 Published on: March 5, 2026
Democrate
वर्तमान में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराता तनाव एक विनाशकारी युद्ध का रूप ले चुका है। लेकिन इस पूरे संघर्ष में सबसे बड़ा सवाल ‘लोकतंत्र’ की उस परिभाषा पर खड़ा हो गया है, जिसे अमेरिका और इजरायल दुनिया के सामने परोस रहे हैं। क्या किसी देश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए बच्चों की बलि, शहरों की तबाही और इंसानी खून की नदियां बहाना अनिवार्य है?
विनाश का ‘लोकतांत्रिक’ चेहरा
इजरायल की सैन्य कार्यवाही ने जिस तरह से मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है, वह किसी ‘नरसंहार’ से कम नहीं है। ईरान में लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाला अमेरिका और उसका साथी इजरायल, आज वहां के मासूमों के भविष्य को मलबे में तब्दील कर रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि अगर लोकतंत्र का रास्ता लाशों के ढेर से होकर गुजरता है, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि साम्राज्यवादी क्रूरता है।
किराए के लड़ाके और मानवाधिकार का ढोंग
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस युद्ध में भाड़े के सैनिकों (Mercenaries) का इस्तेमाल और आधुनिक हथियारों से घनी आबादी वाले इलाकों को निशाना बनाना यह दर्शाता है कि मकसद सिर्फ शासन बदलना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता को घुटनों पर लाना है।
एक तरफ अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहता है, वहीं दूसरी तरफ वह उन कार्रवाइयों का समर्थन कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा रही हैं।
एक सवाल जो दुनिया पूछ रही है
क्या हजारों बच्चों की मौत और शहरों की बर्बादी के बाद मिली ‘आजादी’ वास्तव में आजादी कहलाएगी? ईरान में लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर जो तबाही मचाई जा रही है, उसने इजरायल और अमेरिका की नैतिक साख पर गहरे सवालिया निशान लगा दिए हैं।
इतिहास गवाह है कि थोपा गया लोकतंत्र कभी शांति नहीं लाता, केवल अंतहीन प्रतिशोध की आग को जन्म देता है।