📅 Published on: June 17, 2026
Kapilvastupost
*सिद्धार्थनगर।*
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव डॉ. नादिर सलाम ने भाजपा नेता लवकुश ओझा के हालिया वायरल वीडियो पर कड़ा प्रहार किया है। डॉ. सलाम ने इस कृत्य को न केवल शर्मनाक और अमानवीय बताया, बल्कि इसे ईश्वरीय विधान और हमारी सनातन संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ एक गंभीर अपराध करार दिया।
भूख का कोई धर्म नहीं होता: डॉ. नादिर सलाम
डॉ. नादिर सलाम ने कहा कि किसी भूखे व्यक्ति को मात्र दो पूड़ियाँ देने के बदले उससे धार्मिक नारे लगवाना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। उन्होंने कहा: “भूख न हिंदू होती है, न मुस्लिम; प्यास न जाति देखती है, न धर्म। जब कोई व्यक्ति भूखा हो, तो उसकी मदद करना ही सबसे बड़ा ‘मानव धर्म’ है। देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब हमें सिखाती है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च सभी जगहों पर जरूरतमंदों की बिना भेदभाव मदद की जाती है। ऐसे में भोजन के बदले शर्त रखना हमारी सभ्यता और संस्कृति के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।”
ईश्वरीय सत्ता और प्रभु राम के आदर्शों का अपमान
भाजपा नेता को आड़े हाथों लेते हुए डॉ. सलाम ने कहा कि जो लोग खुद को धर्म का ठेकेदार समझते हैं, वे असल में ईश्वरीय सत्ता के सबसे बड़े विरोधी हैं। ईश्वर की नजर में हर इंसान बराबर है, और किसी लाचार की गरिमा को ठेस पहुंचाना उस परम सत्ता का अपमान है।
उन्होंने आगे कहा:
*मर्यादा और करुणा के प्रतीक हैं राम:** भगवान राम को मर्यादा, करुणा, प्रेम और न्याय का प्रतीक माना जाता है।
*आदर्शों का मज़ाक:** उनके पावन नाम का उपयोग किसी गरीब की मजबूरी का मज़ाक उड़ाने, उसे अपमानित करने या उसकी आस्था को चुनौती देने के लिए करना स्वयं प्रभु राम के आदर्शों का अपमान है।
**भंडारे का वास्तविक अर्थ:** भंडारा सेवा, दान और परोपकार का माध्यम होता है, न कि राजनीतिक प्रदर्शन या अपनी धार्मिक श्रेष्ठता साबित करने का कोई मंच।
समाज को तोड़ने वाली कुंठित मानसिकता
कांग्रेस नेता ने साफ किया कि राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। जो लोग धर्म और आस्था का उपयोग अपनी राजनीति चमकाने, लोगों को अपमानित करने या समाज में नफरत फैलाने के लिए करते हैं, वे किसी भी धर्म या विचारधारा के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हो सकते। वास्तव में वही लोग धर्म को गलत ढंग से पेश करके उसका मज़ाक उड़ाते हैं।
**”भूखे को भोजन और प्यासे को पानी देना निश्छल सेवा है; उसे शर्तों और नारों से जोड़ देना मानवता के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। धिक्कार है ऐसी मानसिकता पर, जो इंसान को इंसान नहीं बल्कि उसकी पहचान से तौलती है। समाज को यह संदेश देना होगा कि इंसान की इज्जत, उसकी आस्था और उसकी गरिमा का सम्मान हर हाल में होना चाहिए। मानवता सबसे ऊपर है, और हमेशा रहेगी।”