गुरु जी की कलम से: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? धर्मेंद्र प्रधान और छात्र आंदोलनों की विडंबना

गुरु जी की कलम से
इतिहास अक्सर अपने आप को हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन वह ऐसे दृश्य अवश्य रचता है जो हमें अतीत की याद दिला देते हैं। देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक जीवन भी आज कुछ ऐसी ही विडंबना के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है।
1996 का वह आंदोलन: जब धर्मेंद्र प्रधान थे छात्रों की आवाज
करीब तीन दशक पहले, वर्ष 1996 में ओडिशा में कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के बाद छात्रों का जबरदस्त आंदोलन हुआ था। उस समय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव रहे धर्मेंद्र प्रधान स्वयं सड़कों पर उतरकर परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे थे। उनका स्पष्ट मानना था कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
समय का चक्र: आंदोलनकारी से व्यवस्था के शीर्ष तक
समय बदला, जिम्मेदारियां बदलीं और धर्मेंद्र प्रधान देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद तक पहुंचे। लेकिन आज परिस्थितियां एक अलग सवाल खड़ा करती हैं। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे विवादों ने देशभर में छात्रों के बीच भारी असंतोष पैदा किया है। यही वह स्थिति है जिसने लोगों को 1996 के उस छात्र आंदोलन की याद दिला दी, जिसमें कभी धर्मेंद्र प्रधान स्वयं व्यवस्था के खिलाफ संघर्षरत थे।
आरोप-प्रत्यारोप नहीं, ऐतिहासिक विडंबना का आईना
यह संदर्भ किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने या किसी राजनीतिक निर्णय का समर्थन अथवा विरोध करने के उद्देश्य से नहीं है। बल्कि यह उस ऐतिहासिक विडंबना की ओर संकेत करता है, जहां कभी व्यवस्था से जवाब मांगने वाला व्यक्ति आज स्वयं व्यवस्था का सबसे बड़ा जिम्मेदार चेहरा बन जाता है।
लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है कि सत्ता में बैठे लोगों से वही प्रश्न पूछे जाते हैं, जो कभी उन्होंने स्वयं सत्ता से पूछे थे। इतिहास नेताओं को केवल पद नहीं देता, बल्कि उनके पुराने विचारों और संघर्षों का आईना भी समय-समय पर उनके सामने रखता है।
पारदर्शिता और जवाबदेही ही एकमात्र रास्ता
आज प्राथमिक आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाया जाए। देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य किसी भी प्रकार की लापरवाही या भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में छात्रों का विश्वास तभी कायम रहेगा जब पारदर्शी प्रक्रिया, निष्पक्षता और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
धर्मेंद्र प्रधान की यह राजनीतिक यात्रा स्पष्ट सिखाती है कि संघर्ष और सत्ता के बीच की दूरी बहुत कम होती है। जो कभी प्रश्न पूछता है, एक दिन उसी से उत्तर भी मांगा जाता है। शायद यही इतिहास का सबसे बड़ा संदेश है—पद बदल सकते हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएं और युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी कभी नहीं बदलती।