📅 Published on: February 3, 2026
Health desk | kapilvastupost
गर्भावस्था हर महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर होता है, लेकिन जब यह हाई रिस्क प्रेगनेंसी में बदल जाती है तो सावधानी कई गुना बढ़ जाती है। इस विषय पर महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. सलोनी उपाध्याय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हाई रिस्क प्रेगनेंसी को बीमारी नहीं, बल्कि एक चेतावनी समझना चाहिए—जिसमें समय पर जांच और सही देखभाल से माँ और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं।
डॉ. सलोनी का कहना है हाई रिस्क प्रेगनेंसी वह स्थिति होती है जिसमें गर्भवती महिला या गर्भ में पल रहे शिशु को सामान्य से अधिक स्वास्थ्य जोखिम हो सकता है। ऐसे मामलों में नियमित एंटीनेटल चेकअप और विशेषज्ञ निगरानी बेहद जरूरी होती है।
किन कारणों से प्रेगनेंसी हाई रिस्क बनती है
डॉ. सलोनी उपाध्याय बताती हैं कि महिला की उम्र 18 वर्ष से कम या 35 वर्ष से अधिक होना, पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, खून की कमी, मोटापा, बार-बार गर्भपात या पहले सिजेरियन डिलीवरी—ये सभी हाई रिस्क प्रेगनेंसी के प्रमुख कारण हो सकते हैं।
इसके अलावा जुड़वां गर्भ, प्रेगनेंसी में शुगर, प्री-एक्लेम्पसिया, प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएं और संक्रमण भी जोखिम बढ़ाते हैं।
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
डॉ. सलोनी के अनुसार, चेहरे और पैरों में अत्यधिक सूजन, तेज सिरदर्द, आंखों से धुंधला दिखना, पेट में तेज दर्द, योनि से रक्तस्राव, बच्चे की हलचल कम होना—ये सभी संकेत तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने के हैं।
सही देखभाल से सुरक्षित डिलीवरी संभव
महिला डॉक्टर सलोनी उपाध्याय जोर देकर कहती हैं आज मेडिकल साइंस काफी उन्नत है। अगर महिला समय पर जांच कराए, डॉक्टर की सलाह माने और खान-पान व आराम का ध्यान रखे, तो हाई रिस्क प्रेगनेंसी में भी सामान्य और सुरक्षित डिलीवरी संभव है।
डॉक्टर की सलाह
नियमित अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट कराएं, बिना सलाह कोई दवा न लें, संतुलित आहार और पर्याप्त आराम करें।
तनाव से दूर रहें किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत चिकित्सक से मिलें।
बताते चलें कि हाई रिस्क प्रेगनेंसी डरने की नहीं, बल्कि समझदारी और सतर्कता की मांग करती है। डॉक्टर सलोनी उपाध्याय के अनुसार जागरूकता, समय पर इलाज और सकारात्मक सोच से माँ और शिशु—दोनों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।