📅 Published on: May 24, 2026
गुरु जी की कलम से
सिद्धार्थनगर (उत्तर प्रदेश):
“सबका साथ, सबका विकास” और “पारदर्शी शासन” के दावों की धज्जियां उड़ाता एक बेहद गंभीर मामला सिद्धार्थनगर जिले से सामने आया है। यहाँ शोहरतगढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम जिगनीहवा उर्फ धनौरा के निवासी **अताउल्लाह** पिछले कई महीनों से सरकारी विभागों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। विडंबना देखिए कि जिस तंत्र को जनता की सुरक्षा और न्याय की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वही तंत्र पीड़ित को सही रास्ता दिखाने के बजाय केवल दफ्तरों के चक्कर लगवाकर गुमराह कर रहा है।
*क्या है पूरा मामला?
पूरा मामला विकास खंड बढ़नी के नेशनल हाईवे निर्माण से जुड़ा है। इस हाईवे के दायरे में अताउल्लाह की कीमती पैतृक जमीन आ रही है। नियम और कानून के मुताबिक, किसी भी निजी भूमि पर सरकारी कार्य शुरू करने से पहले उसका विधिवत बैनामा (रजिस्ट्री) होना चाहिए और भू-स्वामी को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
**नियमों को ताक पर रखकर कार्रवाई:** लोक निर्माण विभाग (PWD) ने सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया। बिना किसी लिखा-पढ़ी के, बिना पीड़ित की जमीन का बैनामा कराए और बिना एक भी रुपया मुआवजा दिए, PWD विभाग ने अताउल्लाह की जमीन पर गलत तरीके से निर्माण कार्य शुरू कर दिया।
**अधिकारियों की बहरी और अंधी कार्यप्रणाली पर सवाल**
जब पीड़ित अताउल्लाह ने कानूनी और नियमतः तरीके से विभाग के सामने अपनी आपत्ति दर्ज करानी चाही, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी। सत्ता और पद के मद में चूर विभाग ने बिना किसी सुनवाई के निर्माण कार्य जारी रखा। यह सीधे तौर पर एक गरीब और लाचार नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन है।
पीड़ित ने अपनी अधिग्रहित जमीन के मुआवजे के लिए स्थानीय तहसील प्रशासन से लेकर जिलाधिकारी (DM) तक न्याय की गुहार लगाई। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ ही रहा। आवेदन और प्रार्थना पत्र फाइलों में दबे धूल फांक रहे हैं और पीड़ित दफ्तरों की चौखट पर अपनी चप्पलें घिसने को मजबूर है।
**जिम्मेदार अधिकारियों को कटघरे में खड़े करते कुछ तीखे सवाल:**
* **PWD विभाग से सवाल:** बिना बैनामा और बिना मुआवजा राशि का भुगतान किए, किस कानून के तहत एक निजी भूमि पर सरकारी काम शुरू करा दिया गया? क्या विभाग खुद को देश के संविधान और भूमि अधिग्रहण कानून से ऊपर समझता है?
* **तहसील प्रशासन से सवाल:** जब पीड़ित महीनों से शिकायत कर रहा है, तो लेखपाल और कानूनगो की टीम ने मौके की पैमाइश कर काम को रुकवाने या उचित मुआवजा दिलाने की तत्परता क्यों नहीं दिखाई?
* **अंधेरगर्दी का जिम्मेदार कौन?** क्या विकास के नाम पर किसी गरीब को उसकी संपत्ति से बेदखल कर देना ही उत्तर प्रदेश सरकार की नीति है, या फिर यह स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की सोची-समझी तानाशाही है?
### **क्या कहती है प्रशासनिक व्यवस्था?**
इस बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले को लेकर जब **जिलाधिकारी (DM) सिद्धार्थनगर** से बात की गई, तो उन्होंने हमेशा की तरह एक रटा-रटाया सरकारी जवाब देते हुए कहा:
> *”मामला हमारे संज्ञान में है। जांच करवाकर जल्द ही इस पूरे प्रकरण का निस्तारण (निपटारा) कर दिया जाएगा।”*
साहब! “मामला संज्ञान में है” का यह बोर्ड कब तक टंगा रहेगा? जब तक गरीब किसान का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न पूरी तरह से नहीं हो जाता? देखना यह है कि जिलाधिकारी का यह आश्वासन केवल कागजी साबित होता है या फिर पीड़ित अताउल्लाह को उनकी जमीन का हक और उचित मुआवजा मिलकर रहेगा। PWD विभाग की इस तानाशाही पर शासन स्तर से क्या कार्रवाई होती है, इस पर भी सबकी नजरें टिकी हैं।