📅 Published on: July 12, 2026
गुरु जी की कलम से
*सिद्धार्थनगर।* दावों की चमक और हकीकत के कीचड़ के बीच का फासला देखना हो, तो डुमरियागंज लोकसभा क्षेत्र की इटवा विधानसभा के ग्राम पंचायत औरहवा (टोला बडूईया) चले आइए। यहाँ कागजों पर सरपट दौड़ता ‘विकास’ जमीन पर आते ही दलदल में तब्दील हो चुका है। वर्षों से एक अदद पक्की सड़क के लिए तरस रहे ग्रामीणों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। शासन-प्रशासन की कुंभकर्णी नींद उड़ाने के लिए ग्रामीणों ने किसी दफ्तर के चक्कर काटने के बजाय, सड़क के बीचो-बीच लबालब कीचड़ में धान की रोपाई कर दी। यह अनोखा विरोध प्रदर्शन सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
**आजादी का ‘अमृत काल’ या बदहाली का जाल?**
ग्रामीणों का दर्द बेहद तीखा और जायज है। उनका कहना है कि देश आजादी के दशक पार कर चुका है, लेकिन इस गांव की किस्मत आज भी बदरंग है। बारिश आते ही यह सड़क किसी तालाब या खेत जैसी नजर आने लगती है।
**स्कूली बच्चे:** कीचड़ में फिसलकर बस्ते गीले करने को मजबूर हैं।
**मरीज और बुजुर्ग:** अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते के झटकों और दलदल से अधमरे हो जाते हैं।
**किसान और आम जन:** रोजमर्रा के आवागमन के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं।
**वोट बैंक की राजनीति और खोखले वादे**
नेताओं को चुनाव के वक्त वोट चाहिए, लेकिन चुनाव बीतते ही वादे ‘गायब’ हो जाते हैं। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि क्षेत्रीय सांसद, विधायक और प्रशासनिक अमले को कई बार इस नारकीय स्थिति से अवगत कराया गया, लेकिन सबके कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
गरीब कल्याण संस्था के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष समाजसेवी रामगोपाल यादव ने भी इस गंभीर मुद्दे को कई बार अधिकारियों के सामने प्रमुखता से उठाया। मगर नतीजा वही रहा— ढाक के तीन पात! फाइलों का पेट तो भर गया, लेकिन गांव की सड़क का गड्ढा नहीं भरा।
**आर-पार के मूड में ग्रामीण: “रोड नहीं, तो वोट नहीं!”**
इस बार औरहवा के टोला बडूईया के बाशिंदे सिर्फ गुहार लगाने के मूड में नहीं हैं। धान रोपकर सिस्टम को उसकी औकात दिखाने वाले ग्रामीणों ने अब आर-पार का बिगुल फूंक दिया है।
**ग्रामीणों की दो टूक चेतावनी:** “अगर जल्द ही सड़क का निर्माण कार्य धरातल पर शुरू नहीं हुआ, तो यह आंदोलन उग्र रूप लेगा। आने वाले चुनावों में हम नेताओं को गांव में घुसने नहीं देंगे। सीधा सिद्धांत है— जब तक सड़क नहीं बनेगी, तब तक वोट नहीं देंगे।”
**सिस्टम के गाल पर तमाचा है यह प्रदर्शन**
डिजिटल इंडिया और चमकते गांवों के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच बडूईया गांव की यह बदहाल सड़क हकीकत का आईना है। ग्रामीणों का यह अनोखा प्रदर्शन यह बताने के लिए काफी है कि हुक्मरान भले ही एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर विकास की रूपरेखा तय करते हों, लेकिन जमीन पर जनता आज भी बुनियादी हकों के लिए कीचड़ में धान रोपने को मजबूर है।
अब देखना यह है कि इस तीखे विरोध और ‘वोट बंदी’ की चेतावनी के बाद प्रशासनिक अधिकारियों और सोए हुए जनप्रतिनिधियों की गैरत जागती है, या फिर यह गांव अगले चुनाव तक यूं ही कीचड़ में सिसकता रहेगा!