चमकती झालरें, बुझते दीये: सिद्धार्थनगर के कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी का संकट, पुश्तैनी कारोबार पर मंडराया खतरा
📅 Published on: October 28, 2026
कपिलवस्तुपोस्ट की विशेष रिपोर्ट
रोशनी के पावन पर्व दीपावली पर जहां पूरा देश जगमगा उठता है, वहीं दूसरी ओर इस पर्व को अपनी कला से रोशन करने वाले कुम्हारों के घरों में अंधेरा गहराता जा रहा है। बाजारों में धड़ल्ले से बिक रही रंग-बिरंगी चाइनीज झालरों, एलईडी लाइटों और प्लास्टिक के दीयों ने पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सालभर मेहनत के बाद आने वाले इस सबसे बड़े त्योहारी सीजन में भी उचित मुनाफा न मिलने से इन परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
लंबी मेहनत, पर नतीजा निराशा
मिट्टी के दीये सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक हैं। लेकिन इन्हें तैयार करने वाले कुम्हारों का संघर्ष किसी से छिपा नहीं है। सिद्धार्थनगर के कुम्हारों के अनुसार, दीये बनाने की प्रक्रिया बेहद कठिन और लंबी होती है—दूर-दराज से मिट्टी जुटाना, उसे गंधाना, चाक पर दीये गढ़ना, उन्हें धूप में सुखाना और फिर आंवां (भट्टी) में पकाना। इस पूरी प्रक्रिया में भारी मेहनत और लागत लगती है, लेकिन आधुनिक सजावटी लाइटों के चलन के कारण अब मेहनत के मुकाबले आधी कीमत भी नहीं मिल पाती है।
सरकारी उपेक्षा और भू-माफियाओं का दर्द
इस पुश्तैनी धंधे से जुड़े उसई प्रजापति, जो पिछले करीब 20 वर्षों से मिट्टी के दीये बना रहे हैं, अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं कि बाजार में चीनी सामान की भरमार ने उनके कारोबार की कमर तोड़ दी है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पास जमीन का पट्टा होने के बावजूद उस पर कुछ लोगों का अवैध कब्जा है, जिससे उन्हें मिट्टी जुटाने में भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
दुखद पहलू यह है कि इतनी समस्याओं के बाद भी इन पारंपरिक कारीगरों को अब तक किसी भी सरकारी योजना या आर्थिक मदद का लाभ नहीं मिल पाया है। परिवार का पेट पालना तक मुश्किल हो जाने के कारण कई कुम्हारों को मजबूरन अपने पुश्तैनी काम को छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर दिहाड़ी मजदूरी करने का रास्ता चुनना पड़ रहा है।
कुम्हारों की गुहार और जनता से अपील
संकट से जूझ रहे उसई प्रजापति और अन्य स्थानीय कुम्हारों ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि:
बाजार में बिकने वाले चाइनीज सजावटी सामानों और झालरों पर रोक लगाई जाए।
पारंपरिक कुम्हारों को सीधी आर्थिक राहत और सहायता पहुंचाई जाए।
उनकी जमीनी समस्याओं (जैसे मिट्टी उठाने और पट्टे की जमीन) का जल्द समाधान किया जाए।


