📅 Published on: September 29, 2025
विकास खंड बढ़नी के कुछ सचिव न तो फील्ड में ही दिखते हैं और न ही ब्लॉक पर
गुरु जी की कलम से
सिद्धार्थनगर जिले के बढ़नी विकास खंड की लगभग 77 ग्राम सभाओं में विकास कार्यों के लिए निकाले गए टेंडर नोटिस में बड़े पैमाने पर धांधली का मामला सामने आया है।
नाली, आरसीसी, पंचायत भवन सहित अनेकानेक कार्यों के लिए जारी इन टेंडरों में कथित तौर पर नियमों और शर्तों को दरकिनार कर ग्राम प्रधानों या उनके चहेतों को ही ठेकेदार बना दिया गया है, जिससे गांवों के वास्तविक विकास पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
मनमाने ढंग से खोले गए टेंडर, नियमों का मखौल
ग्राम पंचायतों में टेंडर प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं।
भनक तक नहीं: स्थानीय लोगों और बाहरी ठेकेदारों का कहना है कि उन्हें निविदा टेंडर डालने और खुलने की भनक तक नहीं लगी। न ही टेंडर की सूचना नोटिस बोर्ड पर चस्पा की गई, जैसा कि पंचायत एक्ट में निर्देशित है।
प्रधान बने ठेकेदार: आरोप है कि टेंडर नोटिस में वर्णित नियमों और शर्तों को ताक पर रखकर मनमाने तरीके से टेंडर खोले गए। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ संबंधित ग्रामों के ग्राम प्रधानों को ही ठेकेदार बना दिया गया।
अधिनियम का उल्लंघन: पंचायत एक्ट के अनुसार टेंडर प्रक्रिया को सार्वजनिक करना और अधिकारियों के समक्ष खोलना अनिवार्य है, लेकिन इस प्रक्रिया का खुलेआम मखौल उड़ाया गया।
ग्राम प्रधानों का भी यह कहना है कि टेंडर नोटिस का कार्य ग्राम प्रधान ही करवाते हैं, और टेंडर नोटिस में लिखना केवल ‘कागज़ का पेट भरने’ के लिए होता है। उनका दावा है कि इस बात की जानकारी संबंधित अधिकारियों को अक्षरशः होती है।
कमीशनखोरी और अधिकारियों की ‘कृपा’
विकास कार्यों में धांधली के इस खेल में ग्राम सचिवों और अन्य अधिकारियों की कथित भूमिका भी सामने आई है।
कमीशन का खेल: ग्राम प्रधानों ने शिकायत की है कि ग्राम पंचायत के कार्य करवाने के बाद उन्हें 6 से 7 प्रतिशत तक कमीशन देना पड़ता है, तभी कराए गए कार्यों का भुगतान होता है। यह ‘सुकराना’ दिए बिना विकास का पहिया नहीं घूमता।
सचिवों की भूमिका: सरकारी सूत्रों का भी मानना है कि टेंडर नोटिस के नियमों को ताक पर रखकर कुछ ग्राम सचिवों की कृपा पर ही ग्राम प्रधानों द्वारा ठेकेदारी की जा रही है।
प्राइवेट ‘मुंशी’ और नदारद अधिकारी
विकास खंड बढ़नी में ग्राम पंचायत अधिकारी (GPO) और ग्राम विकास अधिकारी (VDO) की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
कार्यभार की समस्या: विकास खंड में लगभग आधा दर्जन से अधिक GPO और VDO हैं, जिनके बीच 77 गांव बांटे गए हैं। प्रधानों का कहना है कि अधिकारियों के पास स्वयं सरकारी कार्य करने की फुर्सत नहीं है।
शासकीय निर्देशों का उल्लंघन: कई अधिकारियों ने ग्राम सभाओं के कार्यों को निपटाने के लिए प्राइवेट ‘मुंशी’ रखे हुए हैं, जबकि शासन का स्पष्ट निर्देश है कि सरकारी कार्य के लिए निजी व्यक्ति को नहीं रखा जाएगा। प्रश्न उठता है कि इन प्राइवेट मुंशियों का वेतन किस मद से दिया जाता है।
लापरवाही: अक्सर, जब ग्रामीण विकास से जुड़ी समस्याओं को लेकर आते हैं, तो ये ग्राम पंचायत अधिकारी और ग्राम विकास अधिकारी नदारद रहते हैं।
जांच की मांग पूरे मामले को लेकर सरकारी सूत्रों का भी कहना है कि टेंडर नोटिस में छपे नियमों और शर्तों का पालन नहीं हुआ है। बाहरी ठेकेदारों को टेंडर डालने और खुलने की कानो-कान खबर तक नहीं लगी। इस पूरे प्रकरण में उच्च जांच बोर्ड बिठाए जाने की मांग उठ रही है ताकि भ्रष्टाचार की असलियत सामने आ सके।
कुल मिलाकर, विकास खंड बढ़नी, सिद्धार्थनगर, में कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और दलालों के गठजोड़ के कारण विकास का कार्य भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबता दिख रहा है, जिससे गांवों के वास्तविक विकास की गति रुक गई है।