📅 Published on: October 16, 2025
जनरेशन ‘जेन-जी’ के उभार और राजशाही की आहट के बीच पुराने राजनीतिक दलों में डर का माहौल
परमात्मा उपाध्याय की रिपोर्ट
नेपाल की राजनीति इस वक्त एक खतरनाक और अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है। भंग प्रतिनिधि सभा (एमाले) के सदस्य मंगल प्रसाद गुप्ता का यह बयान कि “इस समय नेपाल का भविष्य अंधे मोड़ पर है,” देश के मौजूदा राजनीतिक संकट की गंभीरता को दर्शाता है। एक तरफ काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने ‘ग्रेटर नेपाल’ के नक्शे को अपने कार्यालय में टांग कर युवाओं के बीच एक नया राष्ट्रवाद छेड़ा है, तो वहीं दूसरी ओर पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने दशहरे के मौके पर ‘अखंड नेपाल’ के नवनिर्माण का भावनात्मक संदेश देकर राजशाही की वापसी की संभावनाओं को हवा दे दी है।
दो ध्रुवों में सिमटती राजनीति: अखंड नेपाल बनाम ग्रेटर नेपाल
नेपाल की राजनीति में डर के इस माहौल में दो नई तरह की लहरें उठती दिखाई दे रही हैं, जो जनता को अपनी ओर खींच सकती हैं:
पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र का ‘अखंड नेपाल’: पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने अपने संदेश में किसी भी “पराधीनता और भू-राजनीतिक जाल में उलझे बिना” अखंड नेपाल के नवनिर्माण की बात कही है। उनका यह संदेश नेपाली जनता को उनके पूर्वजों के “त्याग, बलिदान और अदम्य साहस” की याद दिलाता है, जिसने नेपाल की एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता और संप्रभुता की रक्षा की थी। नेपाली कांग्रेस सहित तमाम बड़े नेताओं का पूर्व नरेश के संपर्क में होना इस बात का संकेत है कि देश का एक बड़ा धड़ा राजशाही की सत्ता की बिसात का हिस्सा बनने को तैयार है।
बालेन शाह का ‘ग्रेटर नेपाल’: रैपर से मेयर बने बालेन शाह युवाओं के एक बड़े वर्ग के लिए नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। उनकी पहचान एक रैपर और स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में है, जिसके बल पर वे काठमांडू जैसे बड़े नगर निगम के मेयर बने। उनके कार्यालय में टंगा ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा (जिसमें नेपाल सीमा से सटे भारत के लंबे-चौड़े भू-भाग को नेपाल का हिस्सा बताया गया है) राष्ट्रीय गौरव की एक नई और विवादास्पद भावना जगा रहा है। जेन-जी आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम आने से स्पष्ट है कि युवा पीढ़ी पुराने राजनीतिक दलों से निराश हो चुकी है और उन्हें बालेन शाह में एक विकल्प दिख रहा है।
जेन-जी आंदोलन: पुराने दलों की राजनीति ‘भस्म’
हालिया आंदोलन ने नेपाल की राजनीति में गहरी खलबली मचा दी है। इस आंदोलन की आग में न केवल सरकारी और निजी संपत्ति जली है, बल्कि देश की राजनीति भी “भस्म हुई है।” जेन-जी समूह ने पुराने राजनीतिक दलों (जिन्होंने लंबे समय तक राजशाही और लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया) में एक ऐसा डर पैदा कर दिया है कि वे अब अपनी वापसी की संभावनाओं को लेकर सशंकित हैं।
भविष्य का सवाल:
नेपाल की मौजूदा सहमी हुई राजनीति अब एक बड़े सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है: क्या अगले आम चुनाव में बालेन शाह ‘ग्रेटर नेपाल’ का मुद्दा उछालकर युवाओं को आकर्षित करेंगे, या फिर वह पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बिछाई जा रही राजशाही सत्ता की बिसात का हिस्सा बनेंगे? इस वक्त नेपाल के सामने विकल्प दो चरमपंथों के बीच फंसा हुआ है: एक तरफ ग्रेटर नेपाल का भावनात्मक, युवा-केंद्रित राष्ट्रवाद, और दूसरी तरफ अखंड नेपाल के नाम पर राजशाही की वापसी की आहट।
नेपाल का लोकतंत्र, जिसका उदय 2008 में राजशाही के अंत के बाद हुआ था, इस दोहरी चुनौती के बीच खड़ा है, जहां पुराने राजनीतिक दल अप्रासंगिक होते जा रहे हैं और देश का भविष्य एक ‘अंधे मोड़’ पर खड़ा दिखाई दे रहा है।