📅 Published on: March 7, 2026
Kapilvastupost
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन कभी-कभी उसकी कीमत इतनी खौफनाक होती है कि आने वाली नस्लें उसे भूल नहीं पातीं। ईरान की धरती पर आज जो बारूद की बारिश हो रही है, उसे अमेरिका और इजरायल ‘लोकतंत्र की बहाली’ का नाम दे रहे हैं। लेकिन क्या दुनिया इतनी नादान है कि वह मलबे के नीचे दबे बच्चों की चीखों और ‘स्वतंत्रता’ के नारों के बीच का अंतर न समझ सके?
लोकतंत्र बनाम नरसंहार
लोकतंत्र एक विचार है, जो संवाद और सहमति से पनपता है। जब इसे मिसाइलों के जरिए किसी संप्रभु राष्ट्र पर थोपा जाता है, तो वह लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक ‘रणनीतिक नरसंहार’ बन जाता है। इजरायली सेना की कार्यवाही और अमेरिकी समर्थन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए मानवाधिकारों की परिभाषा केवल उनकी अपनी सीमाओं तक सीमित है। ईरान के शहरों को कब्रिस्तान में तब्दील करके वहां किस तरह की व्यवस्था खड़ी की जाएगी? क्या लाशों के ढेर पर खड़ा हुआ शासन कभी ‘लोकतांत्रिक’ कहलाने का हकदार होगा?
किराए के सैनिकों का नैतिक पतन
इस युद्ध का सबसे वीभत्स पहलू है ‘किराए के लड़ाकों’ (Mercenaries) का इस्तेमाल। जब कोई देश अपने सैन्य लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पैसों पर लड़ने वाले सैनिकों को भेजता है, तो वहां नैतिकता और युद्ध के नियमों की कोई जगह नहीं बचती। ये लड़ाके किसी आदर्श के लिए नहीं, बल्कि तबाही के बदले मिलने वाले इनाम के लिए लड़ते हैं। अमेरिका जैसे देश का, जो खुद को वैश्विक व्यवस्था का रक्षक कहता है, इन हत्यारों का साथ देना उसकी नैतिक हार को दर्शाता है।
इतिहास से सबक
वियतनाम से लेकर इराक और लीबिया तक, अमेरिका ने जब भी ‘लोकतंत्र’ देने का वादा किया, उन देशों को दशकों पीछे धकेल दिया। आज ईरान में वही खेल फिर से खेला जा रहा है। इजरायल का सैन्य दंश और अमेरिका की कूटनीतिक ढाल मिलकर एक ऐसे विनाश की पटकथा लिख रहे हैं, जिसकी भरपाई आने वाली कई सदियां नहीं कर पाएंगी।
दुनिया को आज यह पूछने की जरूरत है: क्या लोकतंत्र का अर्थ मासूमों का वध है? क्या शहर तबाह करके ही ‘आजादी’ मिलती है? यदि ऐसा है, तो यह ‘नया विश्व क्रम’ (New World Order) मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।