📅 Published on: July 27, 2026
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
भारत इन दिनों केवल भीषण गर्मी का सामना नहीं कर रहा, बल्कि अपनी ऊर्जा व्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा से भी गुजर रहा है। पारा 44 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच चुका है। रातें भी गर्म हैं और लोगों को राहत केवल पंखों, कूलरों और एयर कंडीशनरों से मिल रही है। ऐसे में बिजली की मांग अपने इतिहास के उच्चतम स्तर पर पहुँच रही है। हर घर, हर बाजार, हर अस्पताल, हर उद्योग और हर कार्यालय बिजली पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हो चुका है।
पर्दे के पीछे का सच: एक बटन दबाने से आगे का नेटवर्क
इस बढ़ती निर्भरता के बीच एक ऐसा सच भी है, जिसे अक्सर लोग गुस्से और असुविधा के कारण भूल जाते हैं। बिजली केवल एक बटन दबाने से नहीं आती। इसके पीछे हजारों किलोमीटर लंबी लाइनें, लाखों पोल, हजारों ट्रांसफॉर्मर, सैकड़ों ग्रिड और हजारों अभियंता एवं कर्मचारी दिन-रात काम करते हैं। जब तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर चला जाता है और बिजली की मांग अचानक रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जाती है, तब पूरी व्यवस्था पर असाधारण दबाव पढ़ना स्वाभाविक है।
भौतिकी का नियम: मशीनें भी आखिर थकती हैं
हम अक्सर मशीनों को निर्जीव समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान का एक सरल नियम है कि हर मशीन की भी एक निश्चित क्षमता होती है। जिस ट्रांसफॉर्मर को सीमित भार उठाने के लिए बनाया गया है, उस पर यदि लगातार उससे कहीं अधिक लोड डाला जाएगा, तो उसका गर्म होना, फेल होना या जल जाना असामान्य नहीं बल्कि स्वाभाविक परिणाम है। यही स्थिति विद्युत केबलों, फीडरों और अन्य उपकरणों की भी होती है। 44 डिग्री तापमान में जब वे लगातार पूरी क्षमता से अधिक काम कर रहे हों, तब छोटी-सी तकनीकी गड़बड़ी भी बड़े फॉल्ट का रूप ले सकती है।
तपन के बीच जान जोखिम में डालते अनाम नायक
दुर्भाग्य यह है कि बिजली जाते ही सबसे पहले लोगों का गुस्सा बिजली विभाग के कर्मचारियों पर निकलता है। फोन पर तीखी बातें, कार्यालयों में हंगामा, मौके पर पहुँचे लाइनमैन से अभद्र व्यवहार और कभी-कभी हिंसा तक की घटनाएँ सामने आती हैं। यह केवल अनुचित ही नहीं, बल्कि अमानवीय भी है।
क्या हमने कभी सोचा है कि जिस समय हम अपने घरों में कुछ मिनट की बिजली कटौती से परेशान हो जाते हैं, उसी समय एक लाइनमैन 44 डिग्री की धूप में गर्म लोहे के खंभे पर चढ़कर बिजली बहाल करने की कोशिश कर रहा होता है? उसके सिर पर हेलमेट है, शरीर पर सुरक्षा उपकरण हैं, लेकिन तपती धूप और बिजली का खतरा हर पल उसके साथ रहता है। वह भी किसी परिवार का सदस्य है। उसके घर में भी बच्चे उसका इंतजार करते हैं। उसके माता-पिता, पत्नी और परिवार भी उसकी सुरक्षित वापसी की कामना करते हैं।
बिजली कर्मचारियों का कार्य केवल तकनीकी नहीं, बल्कि अत्यंत जोखिमपूर्ण सेवा है। हर वर्ष अनेक कर्मचारी विद्युत दुर्घटनाओं में घायल होते हैं और कई अपनी जान भी गंवा देते हैं। फिर भी वे बिना किसी प्रचार या सम्मान की अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं। इसलिए जब वे किसी खराबी को ठीक करने पहुँचें, तो उन्हें विरोध नहीं, सहयोग और सम्मान मिलना चाहिए। “ऐसे समय हमारा सबसे बड़ा योगदान केवल इतना हो सकता है कि हम धैर्य रखें, बिजली का विवेकपूर्ण उपयोग करें, कर्मचारियों का सम्मान करें और यह समझें कि हर संकट केवल सरकार या विभाग का नहीं होता, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक परीक्षा होता है।”
सुनील अग्रहरि, नगर पंचायत अध्यक्ष**
बुनियादी ढाँचे का आधुनिकीकरण
समय की सबसे बड़ी माँग
हालाँकि इस समस्या का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। केवल गर्मी को दोष देकर बिजली संकट से पूरी तरह बचा नहीं जा सकता। यह भी स्वीकार करना होगा कि भारत की ऊर्जा अवसंरचना पर लगातार बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और घरेलू विद्युत उपकरणों के बढ़ते उपयोग का भारी दबाव है।
कई स्थानों पर पुराने ट्रांसफॉर्मर अब भी वर्षों से अपनी क्षमता से अधिक भार उठा रहे हैं। अनेक वितरण लाइनें आधुनिकीकरण की प्रतीक्षा में हैं। इसलिए सरकारों और विद्युत वितरण कंपनियों को समय रहते क्षमता विस्तार, स्मार्ट ग्रिड, भूमिगत केबलिंग, अतिरिक्त ट्रांसफॉर्मर और आधुनिक तकनीकों में निवेश करना होगा। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ऊर्जा अवसंरचना को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप मजबूत बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
नागरिक कर्तव्य: ऊर्जा संरक्षण केवल बिल बचाने का जरिया नहीं
केवल सरकार की जिम्मेदारी तय कर देना पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि हर घर बिजली को असीमित संसाधन समझकर उपयोग करेगा, तो कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक दबाव नहीं झेल सकती।
ऊर्जा संरक्षण आज केवल बिजली का बिल कम करने का उपाय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी बन चुका है। जिस कमरे में कोई नहीं है, वहाँ एसी, पंखा या लाइट चलती छोड़ देना केवल व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे बिजली तंत्र पर अनावश्यक बोझ डालना है। पीक आवर्स में भारी विद्युत उपकरणों का सीमित उपयोग, ऊर्जा दक्ष उपकरणों को अपनाना और स्वीकृत विद्युत भार के भीतर रहकर बिजली का उपयोग करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
बिजली चोरी भी इस संकट का एक बड़ा कारण है। अवैध कनेक्शन और अनधिकृत भार केवल राजस्व की हानि नहीं करते, बल्कि ट्रांसफॉर्मरों पर अतिरिक्त दबाव डालकर पूरे क्षेत्र की बिजली व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इसका नुकसान अंततः उन ईमानदार उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता है, जो नियमित रूप से बिल का भुगतान करते हैं।
सामाजिक संवेदनशीलता की आवश्यकता
आज आवश्यकता केवल तकनीकी समाधान की नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी है। बिजली संकट को विभाग और जनता के बीच संघर्ष का विषय बनाने के बजाय साझी जिम्मेदारी के रूप में देखना होगा। जिस प्रकार महामारी के समय डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति समाज ने सम्मान व्यक्त किया था, उसी प्रकार इस भीषण गर्मी में बिजली कर्मचारियों के योगदान को भी समझने और सराहने की आवश्यकता है।
गर्मी का यह दौर भी बीत जाएगा। तापमान सामान्य होगा, बिजली की मांग कम होगी और व्यवस्था फिर संतुलन में लौट आएगी।
लेकिन यह समय हमें एक महत्वपूर्ण सीख देकर जाएगा कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी सुविधाएँ भी सीमित संसाधनों और हजारों लोगों की मेहनत पर आधारित हैं। उनका सम्मान करना हमारा नैतिक दायित्व है।
बिजली की यह चुनौती हमें यही संदेश देती है—संसाधनों का सम्मान कीजिए, ऊर्जा बचाइए, व्यवस्था का सहयोग कीजिए और उन अनाम बिजली कर्मियों को सलाम कीजिए जिनकी मेहनत से हमारे घरों में रोशनी कायम रहती है। जब अगली बार कुछ देर के लिए बिजली चली जाए, तो शिकायत करने से पहले यह याद कीजिए कि कहीं कोई लाइनमैन तपती धूप में आपकी रोशनी लौटाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
मशीनें अपनी पूरी क्षमता से काम कर रही हैं, और इंसान भी अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर सेवा दे रहे हैं।