सिद्धार्थनगर में ‘कागजी विकास’ का खेल, 5 चहेती फर्मों के जरिए ग्राम पंचायतों में लाखों के गबन का आरोप!

शोहरतगढ क्षेत्र के आर टी आई कार्यकर्ता व पत्रकार पंकज चौबे ने उठाए सवाल

Kapilvastupost

सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही जीरो टॉलरेंस की नीति का ढिंढोरा पीट रही हो, लेकिन सिद्धार्थनगर जिले के विकास खण्ड शोहरतगढ़ और जोगिया में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी जमी हुई हैं। पंचायतों के विकास के नाम पर सरकारी बजट को ठिकाने लगाने का एक और बड़ा और गंभीर मामला सामने आया है। विकास कार्यों के लिए सामग्री (मटेरियल) सप्लाई के नाम पर फर्जी बिलिंग और कागजों पर खरीद दिखाकर लाखों रुपये के वारे-न्यारे करने की निष्पक्ष जांच के लिए जिलाधिकारी से गुहार लगाई गई है।

सोशल मीडिया पर वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी पंकज चौबे की पोस्ट के माध्यम से उजागर हुए इस मामले ने पंचायती राज विभाग और संबंधित ब्लॉक के जिम्मेदार अधिकारियों की नींद उड़ा दी है।

5 चहेती फर्मों पर मेहरबान अफसर: क्या सच में पहुंची सामग्री या सिर्फ बंटे कमीशन?

जिलाधिकारी को सौंपे गए पत्र के अनुसार, ग्राम पंचायतों में निर्माण सामग्री की आपूर्ति के नाम पर मुख्य रूप से 5 फर्मों के जरिए भुगतान का खेल खेला गया है:

  1. अमर कंस्ट्रक्शन

  2. सागर ट्रेडर्स

  3. आकाश ट्रेडर्स

  4. RK ट्रेडर्स

  5. SK ट्रेडर्स

आरोप है कि इन फर्मों से सिर्फ कागजी बिल-वाउचर तैयार कराकर सरकारी खजाने से भुगतान निकाल लिया गया। धरातल पर न तो निर्माण सामग्री पहुंची और न ही कोई पारदर्शी खरीद प्रक्रिया अपनाई गई। क्या विकास खण्ड शोहरतगढ़ और जोगिया के जिम्मेदार अधिकारियों को इस खेल की भनक नहीं थी, या फिर साठगांठ का दायरा ऊपर तक फैला हुआ है?

जांच के 9 तीखे सवाल: अगर खेल साफ है, तो इन बिंदुओं पर जांच से क्यों कतरा रहे जिम्मेदार?

शिकायत में जिलाधिकारी महोदय से मांग की गई है कि एक उच्चस्तरीय और तकनीकी टीम गठित कर निम्नलिखित 9 मुख्य बिन्दुओं पर गहन जांच कराई जाए:

  1. फर्मों की भौतिक स्थिति: अमर कंस्ट्रक्शन, सागर, आकाश, RK और SK ट्रेडर्स का पंजीकृत पता, GST विवरण और संबंधित ग्राम पंचायतों से उनकी वास्तविक दूरी का सत्यापन हो।

  2. इनवॉइस एवं बिलों की पड़ताल: इन फर्मों को जारी किए गए बिल, इनवॉइस, चालान और भुगतान विवरण की फॉरेंसिक जांच की जाए।

  3. ई-वे बिल और परिवहन का सच: यदि सामग्री वाकई भेजी गई, तो परिवहन के ई-वे बिल, वाहन संख्या (Vehicle Numbers) और ट्रांसपोर्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं।

  4. स्थलीय भौतिक सत्यापन: कागजों में दर्शाई गई सामग्री की मात्रा और उसकी गुणवत्ता का मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन कराया जाए।

  5. अभिलेखों का मिलान: ग्राम पंचायतों के स्टॉक रजिस्टर, सामग्री प्राप्ति रजिस्टर, माप पुस्तिका (MB) और कार्य अभिलेखों से बिलों का मिलान कराया जाए।

  6. बाजार दर से तुलना: सामग्री किस रेट पर खरीदी गई? क्या स्वीकृत प्राक्कलन (Approved Estimate) और प्रचलित बाजार दर से ऊंचे दामों पर खरीद दिखाकर कमीशन खोरी की गई?

  7. वित्तीय नियमों की अनदेखी: सामग्री खरीद के समय लागू शासनादेश, टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय नियमों का पालन हुआ या उन्हें ठेंगा दिखाया गया?

  8. GST रिटर्न की जांच: क्या इन फर्मों ने वास्तव में सामग्री बेची और उसके सापेक्ष सरकार को GST/कर का भुगतान किया?

  9. वसूली व FIR की कार्रवाई: यदि फर्जी/संदिग्ध बिल, बिना आपूर्ति भुगतान या सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो संलिप्त अधिकारियों, कर्मचारियों और फर्मों से रिकवरी करते हुए दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

अब देखना होगा: क्या डीएम लेंगे कड़ा एक्शन या फाइलों में दब जाएगा भ्रष्टाचार?

ग्राम पंचायतों में विकास का पैसा किसी की निजी तिजोरी भरने के लिए नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाने के लिए आता है। जब तक फर्जी फर्मों और भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ टूटता नहीं, तब तक पारदर्शी विकास का दावा खोखला ही रहेगा।

शिकायतकर्ता ने स्पष्ट मांग की है कि जांच की प्रति और उस पर की गई कार्रवाई की अद्यतन सूचना शिकायतकर्ता को भी उपलब्ध कराई जाए। अब गेंद जिलाधिकारी सिद्धार्थनगर के पाले में है—क्या वे इस गठजोड़ पर बुलडोजर चलाएंगे या यह फाइल भी अन्य जांचों की तरह लालफीताशाही की भेंट चढ़ जाएगी?