📅 Published on: March 19, 2026
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हुए कोर्ट ने साफ कर दिया,कि आस्था और इबादत पर कोई प्रशासनिक दीवार नहीं होती।
कानून का राज डर से नहीं, जिम्मेदारी से चलता है हुजूर,
अनुच्छेद 25 की आजादी ही लोकतंत्र की असली पहचान होती।
Kapilvastupost
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिला प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे सुरक्षित और शांतिपूर्ण वातावरण में नमाज सुनिश्चित करें। कोर्ट ने दो टूक कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म के पालन और प्रार्थना के लिए एकत्रित होने के अधिकार की रक्षा करता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने मुनाजिर खान द्वारा दाखिल याचिका का निस्तारण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
निजी स्थान पर प्रार्थना पर रोक नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि किसी भी व्यक्ति की निजी जगह पर की जाने वाली प्रार्थनाओं या धार्मिक कार्यक्रमों में कोई रुकावट नहीं डाली जा सकती, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो। हालांकि, बेंच ने यह भी जोड़ा कि संविधान प्रार्थना की आड़ में एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म को उकसाने या उकसावे वाली कार्रवाई को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।
प्रशासन को सख्त फटकार: ‘कानून लागू नहीं कर सकते तो इस्तीफा दें’
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सख्त नाराजगी जाहिर की। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि प्रशासन रमजान के दौरान नमाजियों की संख्या को सीमित कर रहा है।
इस पर कोर्ट ने कहा कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। अगर पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है और वे इसी आधार पर नमाजियों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या तबादला करवा लेना चाहिए।
राज्य सरकार की दलीलों को कोर्ट ने किया खारिज
सुनवाई के दौरान अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने तर्क दिया कि प्रशासन ने कभी भी नमाजियों की संख्या (20 उपासक) पर कोई पाबंदी नहीं लगाई थी और यह गलतफहमी याचिकाकर्ता के वकील की गलतबयानी से पैदा हुई। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 27 फरवरी का आदेश खुली अदालत में दोनों पक्षों की मौजूदगी में दिया गया था और उस समय राज्य की ओर से कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई थी।
वर्तमान स्थिति और भविष्य के निर्देश
कोर्ट ने सप्लीमेंट्री हलफनामे और तस्वीरों की जांच के बाद यह दर्ज किया कि जिस इमारत का जिक्र हो रहा है, वह वर्तमान में ‘मस्जिद’ के रूप में दर्ज नहीं है। फिर भी, यह देखते हुए कि उस स्थान का उपयोग पहले नमाज के लिए होता रहा है, कोर्ट ने निर्देश दिया कि वहां पूजा करने वाले भक्तों को कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए।
अंत में, कोर्ट ने राज्य सरकार को ‘मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिए गए पूर्व के फैसले का पूरी तरह पालन करने का निर्देश देते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया।