📅 Published on: April 3, 2026
काठमांडू | परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
नेपाल सरकार ने एक विवादास्पद निर्णय लेते हुए संघ, प्रदेश और स्थानीय स्तर के सभी सरकारी निकायों को निर्देशित किया है कि वे भविष्य में सभी प्रकार के विज्ञापन और सूचनाएं केवल सरकारी संचार माध्यमों (जैसे गोरखापत्र, रेडियो नेपाल और नेपाल टेलीविजन) में ही प्रकाशित/प्रसारित करें। प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय द्वारा बुधवार को इस संबंध में सभी निकायों को पत्र जारी कर दिया गया है।
सरकार के इस कदम का उद्देश्य विज्ञापनों में होने वाले भ्रष्टाचार और ‘कमीशन खेल’ को रोकना बताया जा रहा है, लेकिन निजी मीडिया जगत ने इसे ‘प्रेस की स्वतंत्रता पर आर्थिक नाकाबंदी’ करार दिया है।
सरकार का तर्क: भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर लगाम
मंत्रिपरिषद कार्यालय के अनुसार, वर्तमान में विज्ञापनों का एक बड़ा हिस्सा ऐसी पत्रिकाओं में छपता है जो जनता तक पहुँचती ही नहीं हैं। विज्ञापन एजेंसियां और बिचौलिए सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से 95% तक छूट का खेल खेलते हैं और नकली बिलों के माध्यम से राजकोष को अरबों का चूना लगाते हैं। कई बार सूचनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह जाती हैं और आम जनता को इसकी जानकारी नहीं मिल पाती।
मीडिया जगत का विरोध: “लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार”
सरकार के इस फैसले से नेपाल पत्रकार महासंघ, नेपाल विज्ञापन एजेंसी संघ और मीडिया समिति ने कड़ा विरोध जताया है:
* आर्थिक संकट: छोटे अखबारों, स्थानीय पत्रिकाओं और ऑनलाइन पोर्टल्स का अस्तित्व विज्ञापनों पर निर्भर है। इस निर्णय से सैकड़ों मीडिया संस्थान बंद होने की कगार पर पहुँच सकते हैं।
* विशेषज्ञों की राय: प्रेस काउंसिल नेपाल के पूर्व अध्यक्ष और अन्नपूर्णा पोस्ट के प्रधान संपादक बालकृष्ण ने इसे मीडिया पर ‘आर्थिक नाकाबंदी’ कहा है। उनका मानना है कि व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की जरूरत थी, न कि विज्ञापन बंद करने की।
* मदन लम्साल (अध्यक्ष, मीडिया समिति): उन्होंने इस कदम को ‘गलत नीयत’ से प्रेरित बताया, जिससे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर होगा।
निजी मीडिया घरानों का कहना है कि यह निर्णय एक पक्षीय है और इससे प्रेस की विविधता और निष्पक्षता पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।