📅 Published on: April 3, 2026
त्रिलोकपुर पुलिस को शोहरतगढ़ थाना प्रभारी नवीन कुमार सिंह से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने लूट की योजना बनाते चार लोगों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया | वहीँ त्रिलोकपुर पुलिस के पास सबूत होते हुवे न्याय नहीं कर पा रहे हैं न्याय करके इस्वर को खुश करने के बजाये राजनीती के दबाव को लात मार कर एक ट्रांसफर लेना कहीं ज्यादा अच्छा है |
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सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ मामूली विवाद ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया। जिले के त्रिलोकपुर थाना क्षेत्र के हरिबंधपुर गांव में बीते 6 मार्च को बकरी चराने को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि दबंगों ने एक महिला और उसके परिवार पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जबकि उसके बच्चों को भी काफी चोटें आई हैं।
पुलिस पर गंभीर आरोप: पीड़ित पर ही दर्ज हुआ मुकदमा
हैरानी की बात यह है कि पीड़ित परिवार जब न्याय की गुहार लेकर त्रिलोकपुर थाने पहुँचा, तो पुलिस की भूमिका संदिग्ध नजर आई। पीड़ित पति फारूक का आरोप है कि पुलिस ने आरोपियों पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टा उन्हीं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया। पीड़ित ने थाना प्रभारी चन्द्रकान्त पांडे पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि मेडिकल रिपोर्ट आने के बावजूद उन्हें रिपोर्ट नहीं दी गई और शिकायत करने पर उन्हें धमकी देकर थाने से भगा दिया गया।
“मेरी पत्नी और बच्चों को गंभीर चोट आई है, मेडिकल रिपोर्ट भी है… लेकिन थाना प्रभारी रिपोर्ट नहीं दे रहे हैं। आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और हमें गांव छोड़ने की धमकियां दे रहे हैं।” > — फारूक, पीड़ित महिला के पति
जांच के नाम पर चुप्पी
पीड़ित परिवार का कहना है कि थाना प्रभारी सजातीय होने के चलते आरोपियों को संरक्षण दे रहे हैं। वहीं, जब इस गंभीर मामले में पुलिस के आला अधिकारियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया और जांच की बात कहकर मामले से पल्ला झाड़ लिया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या रक्षक ही भक्षक की भूमिका में हैं? पीड़ित परिवार अब भी न्याय की आस में प्रशासन की ओर देख रहा है।
थानाध्यक्ष की कार्यशैली: वर्दी पर दाग
त्रिलोकपुर थाना प्रभारी पर लगे आरोप कि उन्होंने ‘सजातीय’ होने के कारण आरोपियों का पक्ष लिया और मेडिकल रिपोर्ट होने के बावजूद पीड़ित पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया, बेहद शर्मनाक हैं।
जातिगत और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: यदि थानाध्यक्ष का विवेक न्याय के बजाय जाति या समुदाय से प्रभावित है, तो वह उस पद के योग्य नहीं हैं।
सत्ता का दुरुपयोग: पीड़ित को थाने से भगाना और आरोपियों को संरक्षण देना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यह “पीड़ित-दोषारोपण” (Victim Blaming) की वह पराकाष्ठा है, जहाँ अपराधी खुलेआम घूमते हैं और पीड़ित भय के साये में जीने को मजबूर है।
हाल के वर्षों में जिस तरह से विशेष समुदायों और अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा की घटनाओं में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं, वह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरनाक है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।
यदि उच्चाधिकारी अब भी चुप्पी साधे हुए हैं, तो वे भी इस अन्याय में बराबर के भागीदार हैं। सिद्धार्थनगर का यह मामला “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” जैसे नारों की पोल खोलता है। समय आ गया है कि पुलिस को सत्ता की ‘कठपुतली’ बनने से रोककर उसे ‘संविधान का रक्षक’ बनाया जाए।