📅 Published on: April 28, 2026
Kapilvastupost
> “क्या गजब का जादू है हमारे सत्तादल के बुद्धिजीवियों में! घर के पुरुषों की जाति पूछकर उन्हें ‘ओबीसी’ का सर्टिफिकेट थमा दिया जाता है, लेकिन उन्हीं घरों की महिलाएं संसद की दहलीज पर पहुँचते ही ‘जाति-विहीन’ हो जाती हैं। शायद हमारे नीति-निर्माताओं को लगता है कि पिछड़ापन केवल मर्दों की जागीर है, और महिलाओं ने तो संघर्ष के सारे पड़ाव पार कर के सीधे स्वर्ग में सदस्यता ले ली है!”
> “एक तरफ तो हम कहते हैं कि ‘जात न पूछो साधु की’, और दूसरी तरफ बिना जाति देखे हक देने में हाथ कांपते हैं। SC/ST बहनों को उनका हक मिला, जो स्वागत योग्य है, लेकिन OBC महिलाओं को यह कहकर टाल दिया गया कि uske बारे में बाद में देखा जाएगा …. ये उदासीनता OBC समाज की महिलाओं के लिए क्यों समझ से परे…. ? तो क्या मान लिया जाए कि भारत की सड़कों पर जातिवाद है, दफ्तरों में जातिवाद है, लेकिन राजनीति की मखमली कुर्सियों पर बैठते ही जातिवाद का वायरस मर जाता है?”
> “ये छलावा नहीं तो और क्या है? ये तो वही बात हुई कि दावत सबको दी गई है, लेकिन थाली सिर्फ उनके लिए लगाई गई है जिनके पास पहले से ही अपना चम्मच है। पिछड़ी महिलाओं से कहा जा रहा है कि तुम पहले पुरुषों की भीड़ में अपनी जाति लड़ो, और फिर महिलाओं की भीड़ में अपनी हैसियत। वाह! इसे साजिश कहें या ‘पॉलिटिकल कॉमेडी’?”
> क्या महिला समाजों में जातिवाद खत्म हो चुका है?**
इस सवाल पर कटाक्ष करना भी जरूरी है क्योंकि वास्तविकता इसके उलट है:
विशेषाधिकार का पर्दा:** अक्सर संपन्न वर्ग की महिलाएं कहती हैं कि “आरक्षण जाति पर नहीं, जेंडर पर होना चाहिए।” यह कहना आसान है क्योंकि उनके पास संसाधन और शिक्षा की विरासत है। एक खेत में काम करने वाली OBC महिला और शहर के कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ी महिला की रेस एक ही ट्रैक पर कैसे हो सकती है?
दोगला मापदंड:** जब शादियों की बात आती है, तब तो ‘जाति’ सबसे ऊपर होती है। जब वोट बैंक की बात आती है, तब भी ‘जाति’ सबसे ऊपर होती है। लेकिन जब सत्ता में हिस्सेदारी देने की बात आई, तो अचानक महिला समाज को ‘जाति-मुक्त’ घोषित कर दिया गया?
प्रतिनिधित्व का अभाव: अगर जातिवाद खत्म हो गया होता, तो आज बिना आरक्षण के भी संसद में पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों की महिलाओं की संख्या उनकी आबादी के अनुपात में होती। पर हकीकत क्या है? वहां आज भी चंद खास तबकों का ही बोलबाला है।
यह समझना या समझाना कि महिलाओं में जातिवाद नहीं है, वैसा ही है जैसे यह कहना कि “अंधेरे में सूरज उग आया है।” जब तक सामाजिक सच्चाई को स्वीकार कर **’कोटा के भीतर कोटा’** नहीं दिया जाता, तब तक यह नारी …… सामाजिक न्याय की कसौटी पर अधूरा ही रहेगा। जय भीम ! जय भारत ! जय संविधान!