📅 Published on: May 17, 2026
**सिद्धार्थनगर / ब्यूरो।**
आज की राजनीति और राजनेताओं के ठाट-बाट को देखकर अक्सर आम जनता के मन में कई सवाल कौंधते हैं। इसी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था, मंत्रियों के दौर-दौरे और जनता के पैसे पर पलने वाले उनके ‘कुनबे’ (परिवार) पर वरिष्ठ लेखक ‘गुरु जी’ ने अपनी कलम से एक बेहद तीखा और मर्मस्पर्शी प्रहार किया है। गुरु जी का कहना है कि आज के हमारे ‘मंत्री जी’ तो महान अर्थशास्त्री और राष्ट्रभक्त आचार्य चाणक्य से भी कई कदम आगे निकल गए हैं।
चाणक्य का राष्ट्रधर्म बनाम आज के मंत्रियों का ‘कुनबा धर्म’
गुरु जी लिखते हैं कि इतिहास गवाह है कि आचार्य चाणक्य सिर्फ उस समय राष्ट्रीय धन का उपयोग करते थे, जब वे राष्ट्र के कार्य के प्रति समर्पित होते थे। लेकिन आज की तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है।
जनता पर बोझ:** आज के नेता या मंत्री जैसे ही पद संभालते हैं, वे अकेले नहीं बल्कि अपने पूरे कुनबे (परिवार और रिश्तेदारों) के साथ व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं।
शाही खर्च:** ऐसा लगता है कि मंत्री जी के साथ-साथ उनके पूरे कुनबे का भारी-भरकम खर्च उठाना भी जनता की मजबूरी बन चुका है। जनता के टैक्स का पैसा विकास में लगने के बजाय नेताओं के पारिवारिक ऐश-ओ-आराम में स्वाहा हो रहा है।
जब चाणक्य ने विदेशी मेहमान के सामने बुझा दिया था ‘सरकारी दीया’
इस कड़वे सच को उजागर करने के लिए गुरु जी ने इतिहास की एक बेहद मशहूर और प्रेरक घटना का जिक्र किया है। यह घटना आज के उन हुक्मरानों के मुंह पर करारा तमाचा है जो सरकारी गाड़ियों, बंगलों और भत्तों का निजी इस्तेमाल शान से करते हैं।
सायंकाल का समय था। बिजली नहीं थी और प्रकाश के लिए तेल के दीये जलाए जाते थे। आचार्य चाणक्य एक दीपक के प्रकाश में कुछ महत्त्वपूर्ण राजकीय अभिलेख लिख रहे थे, तभी वहां एक विदेशी यात्री उनसे मिलने आया। आचार्य ने उसका स्वागत किया और पहले अपना लेखन कार्य पूरा किया।
कौतूहल का विषय बनी वह घटना:
लेखन कार्य पूरा होते ही आचार्य चाणक्य ने एक अनोखा काम किया। उन्होंने सामने जल रहा दीया बुझा दिया और पास रखा दूसरा दीया जलाया। विदेशी यात्री यह देखकर चकित रह गया। उसे लगा कि शायद भारत में अतिथि के आने पर ऐसा करने की कोई धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा होगी। उसने उत्सुकता वश पूछ ही लिया— *”क्या आपके देश में अतिथि के आने पर जलता हुआ दीपक बुझाकर दूसरा दीपक जलाने की कोई प्रथा है?”*
“व्यक्तिगत बात के लिए राष्ट्र का तेल क्यों जले?”
यात्री के इस सवाल पर आचार्य चाणक्य ने जो जवाब दिया, वह आज के हर राजनेता के लिए एक सीख है। चाणक्य ने बड़ी सहजता से कहा:
“ऐसा नहीं है मित्र! मैं अभी जिस दीप के प्रकाश में लिख रहा था, वह दीप, उसमें भरा तेल और मेरा कार्य… तीनों इस राष्ट्र के थे। यानी मैंने राष्ट्र का कार्य राष्ट्र के धन से किया। लेकिन अब मैं आपसे जो चर्चा करने जा रहा हूं, वह मेरा व्यक्तिगत विषय है, राष्ट्र का नहीं! मेरी निजी बातचीत में राष्ट्र का एक बूंद तेल भी बर्बाद न हो, इसीलिए मैंने सरकारी दीपक बुझाकर अपना निजी दीपक जलाया है।”
राजनेता तो दूर, जनता भी अभागी है जो सीख नहीं रही
गुरु जी अपनी कलम को विराम देते हुए पूछते हैं कि इतने उच्च वैचारिक धरातल पर रहने वाले महापुरुष को हम कौन सी पदवी दें? कितना शुद्ध आचार, कितना शुद्ध मन और कैसा पवित्र अंतःकरण रहा होगा उनका!
आज के दौर में जहां छोटे से लेकर बड़े जनप्रतिनिधि सरकारी संसाधनों को अपनी बपौती समझ बैठते हैं, उन्हें आचार्य चाणक्य के इस जीवन से बहुत कुछ सीखना चाहिए। लेकिन अफ़सोस, आज कोई सीखना नहीं चाहता। गुरु जी का यह कटाक्ष सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे जनसेवक आखिर कब सच्चे मायनों में ‘सेवक’ बनेंगे?