सिस्टम की ‘शर्मनाक’ सुस्ती: सिद्धार्थनगर में मौत का लाइव वायर बना जमीन पर रखा ट्रांसफार्मर, कब जागेगा कुंभकर्णी नींद में सोया बिजली विभाग?

गुरु जी की कलम से*विशेष रिपोर्ट (सिद्धार्थनगर, यूपी):*
कहते हैं सरकारी विभागों को जब तक किसी बड़े हादसे या किसी की मौत का इंतजार न हो, तब तक उनकी फाइलें आगे नहीं खिसकतीं। ऐसा ही एक जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से सामने आया है। यहाँ बिजली विभाग की घोर और आपराधिक लापरवाही ने पूरे गांव की जान को दांव पर लगा दिया है। डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के **वासा दरगाह पश्चिम डीह** गांव में पिछले एक साल से एक हाई-वोल्टेज ट्रांसफार्मर बिना किसी पोल या ऊंचे चबूतरे के, सीधे नहर पटरी की जमीन पर खुला छोड़ दिया गया है।

आसमान में काले बादल छाते ही और बारिश का मौसम नजदीक आते ही अब ग्रामीणों के हलक में जान अटकी हुई है, लेकिन वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

दो मौतें भी नहीं खोल सकीं अफसरों की आंखें, रास्ते पर बिछा है ‘मौत का जाल’
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ग्रामीणों की जिंदगी से खिलवाड़ है। जिस जगह यह ट्रांसफार्मर जमीन पर लावारिस हालत में पड़ा है, वह गांव का मुख्य रास्ता है। यहाँ से बच्चे, बुजुर्ग और मवेशी रोजाना गुजरते हैं। बिजली विभाग की इस ‘कागजी मुस्तैदी’ का नतीजा यह है कि अब तक करंट की चपेट में आने से **दो बेजुबान बकरियों की दर्दनाक मौत** हो चुकी है।
गांव के ही मकसूद-उल-हक इस सिस्टम की तानाशाही की कहानी बयां करते हैं:
“जब एक साल पहले इसे लगाया जा रहा था, तभी हमने हाथ जोड़कर अधिकारियों से कहा था कि इसे सुरक्षित जगह लगाइए। तब अफसरों ने घुट्टी पिलाई थी कि ‘कुछ दिन में हटा देंगे’। आज एक साल बीत गया, अफसर बदल गए, वादे बदल गए, लेकिन जमीन पर मौत का वो ढांचा वहीं का वहीं खड़ा है।”
> — **मकसूद-उल-हक, ग्रामीण (बाईट-1)**

वहीं, अपनी दो बकरियों को खो चुके पीड़ित ग्रामीण मसउवर अली का गुस्सा और दर्द इस बहरे सिस्टम के खिलाफ चीख-चीख कर गवाही दे रहा है:
> “मेरी दो बकरियां तड़प-तड़प कर मर गईं। तब तो किसी साहब की गाड़ी गांव नहीं आई। अब बरसात आ रही है, पूरा रास्ता कीचड़ और पानी से भर जाएगा। अगर किसी इंसान को करंट लग गया और कोई बड़ा हादसा हो गया, तो क्या बिजली विभाग मेरी बकरियों की तरह इंसानों की लाशें भी गिनकर चला जाएगा?”
> — **मसउवर अली, पीड़ित ग्रामीण (बाईट-2)**
‘आपातकाल’ का बहाना और ‘कार्रवाई’ का रटा-रटाया सरकारी राग!
जब इस पूरे मामले पर घिरे **अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खंड द्वितीय डुमरियागंज, एस के त्रिपाठी* से तीखे सवाल पूछे गए, तो उन्होंने हमेशा की तरह एक रटा-रटाया प्रशासनिक बहाना आगे कर दिया। साहब का कहना है कि यह ट्रांसफार्मर पिछले साल बारिश के मौसम में ‘आपातकालीन स्थिति’ में जमीन पर रख दिया गया था।
> “मामला संज्ञान में आ चुका है। जो कार्यदायी संस्था (ठेकेदार) है, उसे सख्त निर्देश जारी कर दिए गए हैं। बहुत जल्द ट्रांसफार्मर को वहां से हटवाकर सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”
> — **एस के त्रिपाठी, अधिशासी अभियंता (बाईट-3)**

कपिलवस्तु पोस्ट के तीखे सवाल: आखिर इस लापरवाही का ‘गुनाहगार’ कौन?
अधिशासी अभियंता साहब के इस बयान के बाद जनता के मन में कुछ बेहद कड़वे और गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब विभाग को देना ही होगा:
1. **एक साल लंबा आपातकाल?** साहब कह रहे हैं कि पिछले साल बारिश में इमरजेंसी में ट्रांसफार्मर रखा गया था। तो क्या बिजली विभाग का ‘आपातकाल’ पूरे 365 दिन चलता है? एक साल में विभाग को इसे चबूतरे पर रखने का समय नहीं मिला?
2. **शिकायतों की रद्दी क्यों बनाई?** जब ग्रामीण पिछले एक साल से लगातार बिजली दफ्तर के चक्कर काट रहे थे, लिखित और मौखिक शिकायतें दे रहे थे, तो उन अर्जियों को किस कूड़ेदान में फेंका गया?
3. **बेजुबानों की मौत का जिम्मेदार कौन?** करंट से जिन दो बकरियों की मौत हुई, क्या उसका मुआवजा इन लापरवाह अफसरों की सैलरी से कटेगा? या फिर सरकारी रजिस्टर में बेजुबानों की जान की कोई कीमत ही नहीं है?
4. **हादसे के बाद ही जागेगा प्रशासन?** बारिश का मौसम सिर पर है। पानी भरते ही जमीन पर रखे इस ट्रांसफार्मर से पूरे इलाके में करंट फैलने का खतरा है। क्या विभाग किसी इंसानी जान के जाने का इंतजार कर रहा है ताकि मुआवजा बांटकर अपनी पीठ थपथपा सके?

बताते चलें कि बिजली विभाग का यह आश्वासन खोखला है या इसमें दम है, यह तो आने वाले कुछ दिन बता देंगे। लेकिन एक बात साफ है कि सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज का यह बिजली महकमा अपनी आखें मूंदे बैठा है। अगर समय रहते इस मौत के जाल को रास्ते से नहीं हटाया गया, तो आने वाले दिनों में होने वाले किसी भी बड़े हादसे की पूरी और सीधी जिम्मेदारी विद्युत वितरण खंड द्वितीय डुमरियागंज के जिम्मेदार अधिकारियों की होगी। देखना होगा कि साहब का यह ‘जल्द’ कब आता है!