मानक विहीन अस्पतालों और ‘स्वघोषित’ विशेषज्ञ डॉक्टरों के जाल में उलझ रही मासूमों की जिंदगी
📅 Published on: October 5, 2026
अभी महीने भर पहले एक डॉक्टर द्वारा अपने आपको पहले सर्जन कहता रहा बाद में बच्चों का विशेषज्ञ डॉक्टर घोषित करने से आम जनमानस मे गुस्सा है |
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सिद्धार्थनगर (इटवा)। तहसील मुख्यालय इटवा और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर एक बड़ा और जानलेवा खेल जारी है। स्वास्थ्य विभाग के नियमों को ताक पर रखकर चल रहे दर्जनों मानक विहीन अस्पताल, क्लीनिक और फर्जी ‘स्पेशलिस्ट’ डॉक्टरों की फौज सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य और जान-माल के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।
कागजों में विशेषज्ञ, धरातल पर झोलाछाप: फर्जी डिग्रियों का मायाजाल
क्षेत्र में मुख्य सड़कों से लेकर दूर-दराज के चौराहों तक बड़े-बड़े होर्डिंग और आकर्षक बोर्ड टांग दिए गए हैं, जिन पर MD, MS, और सर्जन जैसी बड़ी-बड़ी डिग्रियां लिखी होती हैं।
हकीकत: अधिकांश तथाकथित ‘स्पेशलिस्ट’ डॉक्टरों के पास न तो कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री है और न ही मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन।
जोखिम: बिना किसी विशेषज्ञता के गंभीर बीमारियों का इलाज, जटिल ऑपरेशन और प्रसव (Delivery) कराए जा रहे हैं, जिससे आए दिन मरीजों की जान आफत में पड़ जाती है।
न फायर NOC, न बायोमेडिकल वेस्ट: राम भरोसे चल रहे अस्पताल
इटवा में संचालित हो रहे अधिकांश प्राइवेट नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर बुनियादी मानकों को पूरा नहीं करते:
सुरक्षा के शून्य इंतजाम: आग से बचाव के लिए अग्निशमन विभाग की NOC और प्राथमिक उपकरण न के बराबर हैं।
संक्रमण का खतरा: अस्पतालों से निकलने वाला बायोलॉजिकल वेस्ट (यूज्ड सिरिंज, पट्टियां, बायोमेडिकल कचरा) खुले में फेंका जा रहा है, जिससे आसपास की आबादी में गंभीर बीमारियों का संक्रमण फैलने का डर है।
इमरजेंसी में लाचार व्यवस्था: न तो प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ मौजूद है और न ही वेंटिलेटर या ऑक्सीजन जैसी जरूरी जीवनरक्षक सुविधाएं।
हर हादसे के बाद ‘सेटिंग’ का खेल, कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूरी
गलत इलाज या लापरवाही के कारण जब भी किसी मरीज की हालत बिगड़ती है या मौत होती है, तो मामला बाहर आने से पहले ही दबा दिया जाता है।
बिचौलियों और दलालों के जरिए पीड़ित परिवार पर दबाव बनाकर या रुपयों का लालच देकर आपसी समझौता करा लिया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा यदा-कदा की जाने वाली जांच केवल नोटिस जारी करने या कागजी कोरम पूरा करने तक ही सिमट कर रह जाती है।


