सरकारी दावों की उधड़ती बखिया : 2 शिक्षकों पर महज 3 बच्चे, क्या यही है शिक्षा व्यवस्था का ‘उत्तम प्रदेश’?
📅 Published on: October 23, 2026
सरकारी स्कूलों की यह बदहाली यह साबित करती है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है। यदि समय रहते ऐसे लापरवाह शिक्षकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।
Kapilvastupost
सिद्धार्थनगर (उत्तर प्रदेश) — बेसिक शिक्षा विभाग के बुनियादी ढांचे और सुधार के बड़े-बड़े दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। विकास खंड मिठवल के ‘डड़वा राजा पूर्व माध्यमिक विद्यालय’ में शिक्षा व्यवस्था का ऐसा बदहाल नजारा सामने आया है, जिसने शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और लचर रवैये को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
स्कूल में दो शिक्षक तैनात हैं, लेकिन बच्चों की उपस्थिति का आंकड़ा सिर्फ 3 पर सिमट कर रह गया है। सरकार हर साल शिक्षा के बजट में करोड़ों रुपये का आवंटन दिखाती है, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि सरकारी लापरवाही और शिक्षकों की गैर-जिम्मेदारी के चलते स्कूल खाली पड़े हैं।
मोबाइल में मसरूफ शिक्षक, भविष्य से खिलवाड़
ग्रामीणों का आरोप है कि विद्यालय में तैनात शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के बजाय अपना समय मोबाइल चलाने में व्यतीत करते हैं। वे न तो समय पर स्कूल आते हैं और जैसे ही समय पूरा होता है, ताला बंद करके चले जाते हैं। शिक्षकों की इस बेरुखी और लापरवाही के कारण अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार जनता के टैक्स के पैसे से शिक्षकों को सिर्फ ‘मोबाइल चलाने’ की तनख्वाह दे रही है?
सवाल पूछने पर मीडिया को ही घेरने की कोशिश
जब मीडिया की टीम ने मौके पर पहुंचकर शिक्षकों से इस स्थिति पर जवाब मांगा, तो वे अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय उल्टा मीडियाकर्मियों पर ही हावी होने लगे। शिक्षकों ने गैर-जिम्मेदाराना सवाल दाग दिया कि “विद्यालय के अंदर आने के लिए आपके पास कोई विशेष आदेश है या नहीं?”।
हालाँकि, बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने स्पष्ट किया कि विद्यालय में मीडिया के प्रवेश पर ऐसी कोई रोक नहीं है। लेकिन शिक्षकों का यह ढीट रवैया दर्शाता है कि उन्हें प्रशासनिक कार्रवाई या शासन का कोई डर नहीं रह गया है।
प्रशासन और सरकार से सीधे तीखे सवाल:
निरीक्षण के दावों का क्या हुआ? खंड शिक्षा अधिकारी के नियमित निरीक्षण के दावों के बावजूद 2 शिक्षकों पर केवल 3 बच्चे कैसे रह गए?
जवाबदेही किसकी? जब सरकार सरकारी स्कूलों का प्रचार-प्रसार करती है, तो ऐसे स्कूलों में बच्चों की घटती संख्या और लचर व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
सिर्फ ‘जांच’ या होगी कोई ठोस कार्रवाई? बीएसए ने मामले में जांच कराकर कार्रवाई की बात तो कही है, लेकिन क्या यह जांच भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबा दी जाएगी या वास्तव में कोई ठोस सुधार होगा?


