भ्रष्टाचार पर नकेल कब? लाखों के गबन और घोर लापरवाही में ग्राम पंचायत अधिकारी निलंबित; सरकारी तंत्र की ढिलाई उजागर! 

सिद्धार्थनगर: विकास कार्यों में वित्तीय अनियमितता पर बड़ी कार्रवाई, मगर सवाल व्यवस्था पर

Kapilvastupost

सिद्धार्थनगर : उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में विकास योजनाओं में घोर लापरवाही और वित्तीय अनियमितता के एक मामले में जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) ने ग्राम पंचायत अधिकारी (वीडीओ) भानू प्रताप सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और धन के अपव्यय की ओर स्पष्ट इशारा करती है।

मामला क्या है, और व्यवस्था पर सवाल क्यों?

​निलंबन का आधार वर्ष 2017-18 में लोटन ब्लॉक के ग्राम बस्तिया में पंचायत भवन के निर्माण में की गई अनियमितता है।

प्रथम दृष्टया पुष्टि: डीपीआरओ वाचस्पति झा द्वारा जारी आदेश के अनुसार, वीडीओ भानू प्रताप सिंह पर आरोप है कि उन्होंने आवंटित धन का प्रयोग बिना कार्य पूर्ण कराए ही कर लिया

दस्तावेजों में हेरफेर: आरोप है कि उन्होंने न केवल धन का दुरुपयोग किया, बल्कि सरकारी अभिलेखों में भी हेरफेर किया, जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी की ओर संकेत करता है।

जाँच में पुष्टि: बीडीओ लोटन की जांच रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि नियमों के विपरीत भुगतान किए गए और निर्माण कार्य निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं पाए गए।

सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्न:

​यह घटना एक वी डी ओ के निलंबन से कहीं अधिक है; यह सरकारी व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठाती है।

देरी क्यों? अनियमितताएँ 2017-18 के वित्तीय वर्ष की हैं। यदि पंचायत भवन का निर्माण घटिया था या अधूरा था, तो इतने वर्षों तक उच्च अधिकारियों ने इस गंभीर अनियमितता पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? क्या इसका अर्थ यह है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह से विफल है?

लापरवाह स्थानांतरण: अनियमितता की जाँच लंबित होने के बावजूद, आरोपी अधिकारी को लोटन से खेसरहा ब्लॉक में कैसे स्थानांतरित कर दिया गया? क्या ऐसे अधिकारियों के लिए कोई वाचलिस्ट नहीं है, और क्या ‘पहले काम करो, फिर पूछो’ की संस्कृति को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है?

धन की वसूली: केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है। जिस जनता के पैसे का अपव्यय हुआ है, क्या सरकार उक्त धन की कठोर वसूली सुनिश्चित करेगी और क्या आरोपी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा?

​यह मामला स्पष्ट करता है कि जब तक सरकारी कार्यों में ईमानदार और त्वरित आंतरिक लेखापरीक्षा की प्रणाली लागू नहीं होती, तब तक विकास की योजनाओं का धन इसी प्रकार भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहेगा, और जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित होकर रह जाएगी।

कहाँ गया विकास का पैसा? निलंबन नहीं, व्यवस्था की सर्जरी चाहिए

​सिद्धार्थनगर में एक ग्राम पंचायत अधिकारी (वीडीओ) का निलंबन विकास कार्यों में हुई वित्तीय अनियमितताओं पर एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई भर है। लेकिन यह घटना एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ सरकारी तंत्र के भीतर ‘ऊपर से नीचे तक’ की निगरानी ध्वस्त हो चुकी है।

​सवाल सिर्फ उस वी डी ओ पर नहीं है जिसने 2017-18 में पंचायत भवन के नाम पर जनता के पैसे का गबन किया। असली प्रश्न यह है कि पाँच साल तक जमीनी स्तर पर काम न होने या घटिया निर्माण को उच्च अधिकारियों ने क्यों नज़रअंदाज़ किया? जाँच में देरी और आरोपी अधिकारी का स्थानांतरण यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के प्रति सरकारी तंत्र का रवैया लचर है।

​केवल निलंबन से काम नहीं चलेगा। सरकार को वित्तीय अनियमितता की गहरी जाँच करनी चाहिए, न केवल वीडीओ की, बल्कि उस अवधि के सभी संबंधित ब्लॉक और ज़िला स्तरीय अधिकारियों की भी, जिनकी लापरवाही ने यह लूट संभव बनाई। जब तक जवाबदेही की ज़ंजीर में बड़े अधिकारियों को नहीं बाँधा जाएगा, तब तक विकास का धन कागज़ों पर खर्च होता रहेगा और गाँव की तस्वीर नहीं बदलेगी। अब व्यवस्था की सर्जरी की ज़रूरत है, सिर्फ पट्टी बांधने की नही।