सिद्धार्थ नगर – धनौरा बुजुर्ग में खलिहान के जमीन पर बने अवैध मकानों का मामला , सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की समस्या का संबंध न केवल वर्तमान परिस्थितियों से है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी इसका गहरा संबंध है
📅 Published on: October 27, 2024
कहते हैं पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती एक ही देश के अन्दर दक्षिण प्रदेश की अपेक्षा उत्तर प्रदेश कई साल पीछे बताया जाता है चाहे वह शिक्षा हो संस्कृति हो सभ्यता हो प्रतिव्यक्ति आय हो औद्दोगिक विकास हो , इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी हो , इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में पीछे क्यों है वह भी एक ही झंडे के नीचे
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भारत की आज़ादी के पहले से सुरु करते हैं अंग्रेजों के शासनकाल से ही भारत में गरीबी और अशिक्षा जैसी समस्याएँ व्याप्त रही हैं, जिनके कारण सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और अतिक्रमण की घटनाएँ बढ़ती गईं। उस समय, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय किसानों और मजदूरों से भूमि कर और अन्य कर वसूलने के लिए कठोर नीतियाँ अपनाईं। इसके परिणामस्वरूप, कई लोग अपनी जमीन खो बैठे और विस्थापन का शिकार हो गए।
अशिक्षा और गरीबी ने इस समस्या को और गहरा किया। गरीब परिवारों के पास शिक्षा या रोजगार के साधनों की कमी के कारण, उनके पास अनजाने में सरकारी जमीन पर बसने के अलावा कोई और चारा नहीं था। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनाई गई भूमि-संबंधी नीतियों का परिणाम आज भी दिखाई देता है, जब कई लोग अपनी जीविका के लिए सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बस गए हैं।
अंग्रेजी शासन के समय से ही इस समस्या की जड़ें गहरी होती गईं, जो आज तक प्रभावी हैं। आजादी के बाद भी, इन क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों का अभाव रहा है, जिससे यह प्रवृत्ति बनी रही। इस तरह, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की समस्या का संबंध न केवल वर्तमान परिस्थितियों से है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी इसका गहरा संबंध रहा है।
जब भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, तब देश भुखमरी और अत्यधिक गरीबी की चपेट में था। लाखों लोग ऐसी स्थिति में थे, जहाँ दिन में एक बार भोजन मिलना भी एक बड़ी बात थी। उस समय, लोगों के पास स्थायी रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएँ, और शिक्षा का अभाव था। इस आर्थिक और सामाजिक संकट ने कई परिवारों को कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के लिए मजबूर कर दिया।
आजादी के बाद, सरकार ने भूमि सुधार और विकास योजनाओं की शुरुआत तो की, लेकिन उनका लाभ सभी तक नहीं पहुँच सका। गरीबों और अशिक्षितों को सरकारी योजनाओं और नीतियों का पूरा ज्ञान नहीं था, जिसके कारण वे अपने अधिकारों से वंचित रह गए।
शिक्षा के अभाव में लोगों को रोजगार के सीमित अवसर ही मिल पाते थे, और भूख से जूझते परिवारों के पास जीने का कोई ठोस साधन नहीं था। कई बार लोग उपवास करते थे क्योंकि उनके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होता था।
ऐसी स्थिति में, बेघर और भूमिहीन लोग अपनी सुरक्षा और जीविका के लिए अनजाने में ही सरकारी जमीन पर मकान बनाने लगे।
चूँकि उनके पास जमीन खरीदने या किराये का घर लेने का कोई साधन नहीं था, इसलिए उनके पास सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।
इस तरह, भूख, गरीबी, और अशिक्षा ने मिलकर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है, क्योंकि इसका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। स्वतंत्रता के बाद से ही देश में कई बार जमीन से जुड़े मुद्दे उठे हैं, और यह समस्या गहराती गई है।
अब अगर गलती से अपने ही देश के सरकारी जमीन पर आबाद हो गए तो क्या 50 परिवारों के घरों को उजाड़ना ही एक मात्र विकल्प है ?
जारी नोटिस में श्रीमती काफिया खातून पत्नी हबीबुल्लाह ग्राम धनौरा बुजुर्ग तहसील शोहरतगढ़ जनपद सिद्धार्थनगर द्वारा आईजीआरएस 200182400781 के माध्यम से दिया गया शिकायती प्रार्थना पत्र के निस्तारण हेतु ग्राम धनौरा बुजुर्ग तप्पा ढेबरूआ के गाटा सं० 329/0.467हे0 जो अभिलेख में खलिहान के रूप में अंकित है, बेदखली का आदेश पूर्व में पारित हो चुका है।
पुराणी रंजिश से लैश है शिकायत जब गाँव के लगभग 50 परिवारों का खलिहान की भूमि पर पचास वर्षों से अधिक समय से है निवास ऐसे में एक व्यक्ति के खिलाफ शिकायत का क्या मतलब
उक्त गाटा सं० पर मो० शफी पुत्र हैतुल्लाह द्वारा पक्का मकान बनाकर अवैध कब्जा किया गया है। उक्त अवैध कब्जे को हटाने हेतु तहसीलदार शोहरतगढ़ की अध्यक्षता में निम्नलिखित राजस्व अधिकारी/कर्मचारियों टीम गठित कर दी गयी है। जबकि गाँव के खलिहान पर लगभग 50 परिवार आबाद हैं |
तो क्या अब तहसील प्रशासन धनौरा बुजुर्ग गाँव के खलिहान कि भूमि से अवैध रूप से मकान बनाकर निवास करने वाले पचास परिवारों को उजाड़ कर ही रहेगा |
विकास खंड बढ़नी अंतर्गत धनौरा बुजुर्ग गाँव उत्पन्न इस विकट समस्या को लेकर ग्राम प्रधान अलिमुल्लाह बहुत परेशांन दिखते हैं उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि गरीबी भूखमरी अशिक्षा के कारण आबाद हुवे लगभग पचास परिवाओं को हटाना न्यायिक सामाजिक रूप से सही नहीं होगा प्रशासन को इसके विकल्प तलाश करने होंगे |
इतने बड़े पैमाने लोगों को हटाना उन्हें बेदखली से हटाने से पूर्व राहत व पुनर्वास जैसे मानव अधिकार जैसे मुद्दों को भी देखना और समझना पड़ेगा |
प्रतीकात्मक फोटो


