📅 Published on: April 1, 2025
परमात्मा उपाध्याय की रिपोर्ट
काठमांडू: नेपाल में राजशाही समर्थकों द्वारा हिंसक प्रदर्शन के बाद राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह को नजरबंद कर दिया गया है, उनके पासपोर्ट को जब्त कर लिया गया है और उनकी सुरक्षा में कटौती की गई है। नेपाल की ओली सरकार ने यह कदम उस समय उठाया जब राजधानी काठमांडू में हिंसा भड़क उठी और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना को तैनात करना पड़ा।
राजशाही की वापसी की मांग और हिंसक प्रदर्शन
28 मार्च को काठमांडू में राजशाही की बहाली और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन के दौरान कई सरकारी और निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया, और पुलिस के साथ झड़पें हुईं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
प्रदर्शन के बाद ओली सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह को नजरबंद कर दिया और उनसे सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए लगभग आठ लाख नेपाली रुपये वसूलने की प्रक्रिया शुरू की। सरकार ने राजशाही आंदोलन से जुड़े कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में ले लिया।
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की बढ़ती सक्रियता
नेपाल में राजशाही की मांग अचानक से नहीं उठी है। पिछले कुछ महीनों में पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह लगातार देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर रहे थे और राजशाही समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे। फरवरी में उन्होंने कहा था कि “समय आ गया है कि हम देश की रक्षा करें और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करें।”
हाल ही में जब पूर्व राजा पोखरा प्रवास से काठमांडू लौटे थे, तो हजारों समर्थकों ने उनका स्वागत किया। लोगों ने “राजा आ रहे हैं, महल खाली करो” जैसे नारे लगाए। बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के कारण जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा है, और यही वजह है कि कई लोग राजशाही की वापसी की मांग कर रहे हैं।
ओली सरकार का कड़ा रुख
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने राजशाही समर्थकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का संकेत दिया है। सरकार के वरिष्ठ मंत्री योगेश भट्टराई ने पूर्व राजा की तुलना फ्रांस के राजा लुई 16वें से की और कहा कि “लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश करने वालों का अंजाम भी वैसा ही होगा।” उन्होंने संकेत दिया कि नेपाल में लोकतंत्र को समाप्त करने की कोई भी साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी।
सरकार ने राजशाही आंदोलन के प्रमुख नेता नवराज सुबेदी को घर में नजरबंद कर दिया है और मुख्य कमांडर दुर्गा प्रसाई की तलाश जारी है। इसके अलावा, कई अन्य राजशाही समर्थकों को हिंसा भड़काने के आरोप में हिरासत में लिया गया है।
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का इतिहास
नेपाल में 2008 तक एक संवैधानिक राजशाही थी, लेकिन माओवादी आंदोलन और लोकतांत्रिक बदलावों के चलते इसे धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित कर दिया गया। 16 साल पहले नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। 2008 तक ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के राजा थे, लेकिन उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी और नेपाल में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू हो गई।
पिछले 17 वर्षों में नेपाल में 13 सरकारें बन चुकी हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। जनता का सरकार से मोहभंग होता जा रहा है, और यही कारण है कि राजशाही की मांग फिर से जोर पकड़ रही है।
आगे क्या होगा?
नेपाल में राजनीतिक तनाव बढ़ता जा रहा है। क्या पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे? क्या नेपाल में राजशाही की वापसी संभव है? फिलहाल, ओली सरकार के सख्त रुख को देखते हुए राजशाही समर्थकों को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।