📅 Published on: July 3, 2025
Saddam khan
बस्ती (उत्तर प्रदेश): 3 जुलाई 1857 को ब्रिटिश हुकूमत ने बस्ती जिले के **महुआ डाबर गांव** को घेरकर निर्मम हत्याकांड अंजाम दिया। करीब **5000 निर्दोष भारतीयों** को गोलियों से भूनकर, उनके शवों को आग के हवाले कर दिया गया। गांव को पूरी तरह जमींदोज करके उसका नाम इतिहास से मिटाने की कोशिश की गई। लेकिन दशकों बाद, खुदाई में मिले अवशेषों ने इस **क्रूर नरसंहार** की पुष्टि की। आज भी इस घटना पर ब्रिटिश सरकार ने **माफी तक नहीं मांगी**।
क्या हुआ था महुआ डाबर में?
– **10 जून 1857**: 1857 की क्रांति के दौरान, अंग्रेज अधिकारियों का एक दल महुआ डाबर पहुंचा। यहां के क्रांतिकारियों ने उन पर हमला कर कई अंग्रेजों को मार डाला।
इसके जवाब में, 3 जुलाई 1857 को अंग्रेजों ने गांव को घेरकर भीषण नरसंहार किया। बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों तक को नहीं बख्शा।
गांव को मिटा दिया गया मकान, दुकानें, मस्जिदें और हथकरघा कारखाने—सब जला दिए गए। गांव को गैर-चिरागी (हमेशा के लिए बर्बाद) घोषित कर दिया गया।
झूठा पुनर्वास: असली महुआ डाबर से 50 किमी दूर एक नया गांव बसाकर इतिहास को छिपाने की कोशिश की गई।
खुदाई में मिले सबूत
ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर 2010 में हुई खुदाई में मिले जले हुए मकान, हड्डियां, कारीगरी के औजार और सिक्के इस नरसंहार की पुष्टि करते हैं।
महुआ डाबर संग्रहालय में आज भी इस घटना से जुड़े दस्तावेज और अवशेष सुरक्षित हैं।
जालियांवाला बाग से भी बड़ा नरसंहार, फिर भी चुप्पी क्यों?
– जबकि जालियांवाला बाग हत्याकांड (1919) पर ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों ने माफी मांगी , महुआ डाबर के शहीदों को आज तक ऑफिशियल मान्यता नहीं मिली।
– डॉ. शाह आलम राना (महुआ डाबर संग्रहालय) का कहना है— यह इतिहास का सबसे बड़ा दमन था, लेकिन इसे जानबूझकर छुपाया गया।
खुदाई से हुई पुष्टि के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने “स्वतंत्रता संग्राम सर्किट” में महुआ डाबर को शामिल किया है।
10 जून 2025 से यहां क्रांतिकारियों को शस्त्र सलामी दी जाएगी।
महुआ डाबर की यह कहानी ब्रिटिश राज की क्रूरता और भारतीयों के बलिदान का एक खोया हुआ अध्याय है। अब समय आ गया है कि इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया जाए और दुनिया के सामने लाया जाए।
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*(यह खबर महुआ डाबर संग्रहालय, पुरातत्व विभाग और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है।)*