मानव समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक गुरु नानक देव जी

परमात्मा उपाध्याय की रिपोर्ट

गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु हैं, जिनका जन्म सन 1469 में पाकिस्तान के तलवंडी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनकी माता का नाम तृप्ता और पिता का नाम मेहता कालू था।

उन्होंने समाज में समानता लाने के लिए ‘लंगर’ की परंपरा की शुरुआत की, जो आज भी कायमहै उन्होंने ईश्वर की एकता और समानता पर जोर दिया।

गुरु नानक द्वारा जाति व्यवस्था मूर्ति पूजा और अन्य सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया गया उन्होंने लोगों को ईश्वर की एकता और सभी मनुष्यों की समानता का उपदेश दिया।

उन्होंने ‘नाम जपना’, ‘कीरत करना’, और ‘वंड छकना’ (ईश्वर के नाम का जपना, ईमानदारी से कमाना और साझा करना जीवन) के तीन स्तंभ बताए।

उन्होंने लोभ, मोह, अहंकार, काम और क्रोध जैसे पाँच दोषों का विरोध किया था उन्होंने समाज में व्याप्त आडंबरों और कुरीतियों जैसे सती प्रथा, मूर्ति पूजा और पर्दा प्रथा का कड़ा विरोध किया था उन्होंने चार प्रमुख दिशाओं में लंबी यात्राएँ कीं: पूर्व की ओर (बंगाल और असम), दक्षिण की ओर (श्रीलंका), उत्तर की ओर (कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत) और पश्चिम की ओर (अरब प्रायद्वीप)।

इन यात्राओं को ‘उदासियां’ कहा जाता था और उन्होंने इस दौरान इस्लाम और हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा की, जिसमें मक्का, मदीना और बगदाद जैसे स्थान शामिल थे।

पहली उदासी (1500-1506): यह यात्रा पूर्व की ओर हुई थी, जिसमें बंगाल और असम शामिल थे। इस दौरान गुरु नानक जी ने भारत के कई हिस्सों, जैसे पानीपत, दिल्ली, बनारस और कामरूप (असम) की यात्रा की।

दूसरी उदासी (1506-1513): यह यात्रा दक्षिण की ओर थी, जिसमें श्रीलंका और भारत के कई दक्षिणी राज्यतीसरी उदासी (1515-1518): यह यात्रा उत्तर की ओर हुई, जिसमें गुरुजी ने कश्मीर, कैलाश पर्वत, मान सरोवर और तिब्बत की यात्रा की।

चौथी उदासी (1517-1521): यह यात्रा पश्चिम की ओर थी, जिसमें गुरुजी ने मक्का, मदीना, बगदाद और अरब के अन्य हिस्सों की यात्राएं कीगुरु नानक देव जी की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य मानवता, समानता और धर्मनिरपेक्षता का प्रचार करना था।उन्होंने जातिवाद, छुआछूत और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई।उन्होंने गुरबाणी का प्रचार किया और कई लोगों को प्रेरित किया।

उनकी इन यात्राओं ने सिख धर्म की नींव रखी और विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के बीच समझ और सद्भाव को बढ़ावा दिया। भारत और मध्य पूर्व के कई स्थानों की यात्रा की, जिसे ‘उदासियाँ’ कहा जाता है, और इस दौरान लोगों को अपने उपदेश दिए।

उन्होंने कई भजन (शबद) रचे, जो बाद में पाँचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी द्वारा संकलित किए गए और ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ का हिस्सा बने।1539 में करतारपुर साहिब (पाकिस्तान) में उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त किया था
लोगों कोगुरु नानक देव जी ने समानता और सामाजिक न्याय का संदेश दिया, जो आज भी प्रासंगिकहैउन्होंने ईश्वर की एकता का प्रचार किया, जो सभी धर्मों के लोगों को एक साथ लाने में मदद करता है।

गुरु नानक देव जी ने सेवा और भक्ति का महत्व बताया, जो हमें दूसरों की सेवा करने और ईश्वर के साथ जुड़ने में मदद करता है।