सिद्धार्थ नगर – गेहूँ की बुवाई के बीच ‘जुगाड़’ से बिक रही यूरिया: दर-दर भटक रहे किसान, ‘चहेतों’ की चांदी!

गुरु जी की कलम से

सिद्धार्थनगर। एक तरफ रबी की मुख्य फसल गेहूँ की बुवाई का पीक सीजन चल रहा है और किसानों को तत्काल यूरिया की ज़रूरत है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक लापरवाही और सहकारी समिति की मनमानी ने किसानों को कालाबाज़ारी और शोषण के दलदल में धकेल दिया है।

सिद्धार्थनगर जिले के विकासखंड बढ़नी की न्याय पंचायत रेड़वरिया के अंतर्गत खरिकौरा में स्थित सहकारी समिति पर मंगलवार को यूरिया वितरण के दौरान जो नज़ारा दिखा, वह सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

​एमआरपी ₹266.50, बिक रही ₹290 में: खुलेआम कालाबाज़ारी!

​किसानों के मुताबिक, सहकारी समिति पर यूरिया खाद का वितरण पूरी तरह से ‘जुगाड़’ पर निर्भर था। जिन किसानों का कोई ‘जुगाड़’ नहीं था, उन्हें एक बोरी यूरिया के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ा और अंततः खाली हाथ लौटने को मजबूर होना पड़ा।

​सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस यूरिया की बोरी पर ₹266 रुपये पचास पैसे (सरकारी मूल्य) अंकित है, वही खाद समिति पर खुलेआम ₹290 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से बेंची जा रही थी।

यह निर्धारित मूल्य से चार गुना से भी अधिक की वसूली है, जो यह दर्शाता है कि किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर कालाबाजारी चल रही है।

​मछली बाज़ार जैसी अव्यवस्था, चहेतों को टोकन!

​समिति पर वितरण के दौरान कोई नियम, क़ानून या व्यवस्थित लाइन नहीं थी। किसानों ने बताया कि यहाँ ‘मछली बाज़ार’ जैसा माहौल था। वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था—किसी को टोकन दिया जा रहा था तो किसी को नहीं। यह स्पष्ट रूप से उन ‘चहेतों’ को मनमाफिक खाद देने की साज़िश मालूम होती है, जिनके पास ‘जुगाड़’ था या जो ऊंची कीमत चुकाने को तैयार थे। जबकि साधारण किसान, जो सर्दी में घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर थे, उन्हें निराश लौटना पड़ा।

​कृषि अधिकारी का नहीं उठा फोन: जवाबदेही शून्य!

​इस गंभीर मामले पर जब कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी से बात करने की कोशिश की गई, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। किसानों की समस्या और खुलेआम हो रही कालाबाज़ारी की जानकारी देने के लिए जब कृषि अधिकारी मोहम्मद मुजम्मिल के नंबर पर फोन मिलाया गया, तो घण्टी लगातार बजती रही लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

सवाल यह है कि जब यूरिया की कालाबाज़ारी हो रही है और किसान लुट रहा है, तब जिम्मेदार अधिकारी का फोन क्यों बंद है?

क्या यह मौन सहमति

कालाबाज़ारी करने वालों को प्रोत्साहन नहीं दे रही है?

​जिम्मेदारों को जवाब देना होगा

  • समिति सचिव: ₹266 की यूरिया ₹290 में कैसे बेची जा रही है? क्या इसमें उनकी मिलीभगत है?

  • स्थानीय प्रशासन/कृषि विभाग: आपकी नाक के नीचे यह लूट कब से चल रही है और आप क्या कार्रवाई कर रहे हैं?

  • जिलाधिकारी (सिद्धार्थनगर): क्या किसान ही हमेशा सरकारी तंत्र की लापरवाही और कालाबाज़ारी का शिकार होता रहेगा? इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जाँच कब होगी और दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई कब की जाएगी?

​किसानों को तुरंत निर्धारित मूल्य पर यूरिया उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन बढ़नी में जो हुआ वह दिखाता है कि ज़मीनी हक़ीक़त में ‘जुगाड़’ और ‘कालाबाज़ारी’ ही हावी है।