📅 Published on: December 18, 2025
Kapilvastupost
सिद्धार्थनगर। एक तरफ भारत का अन्नदाता कड़ाके की ठंड में लंबी लाइनों में लगकर यूरिया की एक-एक बोरी के लिए तरस रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत की रियायती (सब्सिडी वाली) खाद सरहद पार नेपाल की औद्योगिक इकाइयों की ‘प्यास’ बुझा रही है।
हाल ही में नेपाल के कपिलवस्तु जिले में स्थित प्लाईवुड फैक्ट्रियों में भारी मात्रा में भारतीय यूरिया की बरामदगी ने सुरक्षा और वितरण प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्लाईवुड उद्योग में यूरिया का खेल
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लाईवुड बनाने की प्रक्रिया में गोंद (Adhesive/Glue) तैयार करने के लिए यूरिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। नेपाल की कई फैक्ट्रियों में इसी औद्योगिक काम के लिए भारत से तस्करी कर लाई गई कृषि यूरिया का उपयोग हो रहा है।
पूरी व्यवस्था जांच के घेरे में
यह कोई छिटपुट घटना नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा नजर आती है। आखिर स्थानीय स्तर पर किल्लत होने के बावजूद तस्करों को इतनी बड़ी मात्रा में यूरिया कहाँ से मिल रही है?
जानकारों का मानना है कि खाद गोदामों, वितरण केंद्रों और सुरक्षा में तैनात जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी तस्करी मुमकिन नहीं है।
यह न केवल सरकारी खजाने (सब्सिडी) का नुकसान है, बल्कि भारतीय किसानों के हक पर सीधा प्रहार है। कृषि प्रधान देश में खाद की कालाबाजारी और सीमा पार तस्करी एक राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है। यदि समय रहते इन तस्करों और लापरवाह तंत्र पर नकेल नहीं कसी गई, तो इसका सीधा खामियाजा देश के गरीब किसानों को भुगतना पड़ेगा।