📅 Published on: December 28, 2025
शोहरतगढ़ और पकड़ी में संचालित अस्पतालों की जांच की मांग
गुरु जी की कलम से
लखनऊ/सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में एक ऐसा “चमत्कार” सामने आया है, जिसने विभाग की पारदर्शिता और दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। महज़ एक डॉक्टर की डिग्री पर दर्जन भर से ज़्यादा अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन होना न केवल विभाग की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है, बल्कि यह आम जनता की ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।
डिग्री एक, दुकानें अनेक: कैसे हुआ यह ‘खेल’?
अयोध्या के निवासी डॉ. मोहम्मद जावेद (MBBS, एनेस्थीसिया, रजिस्ट्रेशन नंबर- 59723) की डिग्री का ऐसा “रबर” की तरह इस्तेमाल किया गया कि उसे खींचकर 15 निजी अस्पतालों तक पहुंचा दिया गया। ऑनलाइन पोर्टल के आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि तीन अस्पतालों में डॉ. जावेद ‘फुल टाइम’ हैं और करीब 12 जगहों पर ‘ऑन-कॉल’ सेवाएं दे रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या डॉक्टर साहब के पास कोई ‘जादुई शक्ति’ है जो वह एक ही समय में लखनऊ, सिद्धार्थनगर और इटावा जैसे अलग-अलग जिलों के अस्पतालों में मौजूद रहते हैं?
सफेदपोश अधिकारियों की ‘मौन’ सहमति?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा आरोपी कोई और नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के वे जिम्मेदार अधिकारी हैं जिनकी नाक के नीचे यह फर्जीवाड़ा फला-फूला।
भौतिक सत्यापन का ड्रामा:
रजिस्ट्रेशन से पहले क्या विभागीय अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच की?
मिलीभगत की बू: चर्चा है कि जब तक विभागीय अधिकारियों को उनकी “मनचाही मिठाई” मिलती रहती है, तब तक फाइलें बंद रहती हैं। जैसे ही ‘लेन-देन’ में खटास आती है, कागजी कार्रवाई का डंडा चलने लगता है।
डिप्टी सीएम के क्षेत्र में सेंध: उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के रडार पर होने के बावजूद, लखनऊ से लेकर सिद्धार्थनगर तक यह गोरखधंधा कैसे चलता रहा?
इन अस्पतालों पर टिकी है संदेह की सुई
जांच में लखनऊ के सुपर जनता, आरोग्य, देवा, रिवाइव, ताहिरा, ग्रो हेल्थ, क्विक रिलैक्स, अर्श, आरजेड, अवध और सिद्धार्थनगर के नोबल व लाइफ केयर जैसे अस्पतालों के नाम सामने आए हैं।
लाइफ केयर अस्पताल पर हुई शिकायत ने इस पूरे ‘नेटवर्क’ का भांडाफोड़ किया है।
जब तक जेबें गरम रहती हैं, विभाग अंधा बना रहता है। यह मामला महज़ एक डॉक्टर का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के उस भ्रष्टाचार का है जो मरीज़ों की जान का सौदा कर रहा है।
अधिकारी अब भी झाड़ रहे पल्ला
हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा खुलासा होने के बाद भी सीएमओ लखनऊ और खुद डॉक्टर जावेद का फोन नहीं उठ रहा है। वहीं सिद्धार्थनगर प्रशासन ‘जांच जारी है’ का पुराना राग अलाप रहा है। सवाल वही है—दोषियों पर कार्रवाई कब होगी, या फिर कागजों में ही अस्पताल चलते रहेंगे और मरीज़ ‘भगवान’ भरोसे मरते रहेंगे?