📅 Published on: May 28, 2026
**नेपाल से परमात्मा प्रसाद उपाध्याय की विशेष रिपोर्ट**
**काठमांडू:**
नेपाल से इस वक्त एक बहुत बड़ी राजनीतिक और कानूनी खबर सामने आ रही है। नेपाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और पूर्व सूचना एवं संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग सहित तत्कालीन सरकार के कई उच्च पदस्थ अधिकारियों को मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी पाया है। आयोग ने बुधवार को इस संबंध में अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट नेपाल सरकार को सौंप दी है और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की है।
### जेन-जी (Gen-Z) आंदोलन की जांच में बड़ा खुलासा
मानवाधिकार आयोग ने पिछले वर्ष 23 और 24 भदौ (भादो) को नेपाल में हुए ‘जेन-जी आंदोलन’ के दौरान घटी घटनाओं की गहन छानबीन की थी। इस आंदोलन के दौरान हुए घटनाक्रमों की जांच के लिए आयोग की सदस्य **लिली थापा** के संयोजकत्व में एक विशेष अनुसंधान टीम का गठन किया गया था। इस समिति द्वारा सौंपे गए प्रतिवेदन (रिपोर्ट) के आधार पर आयोग ने माना है कि तत्कालीन सरकार के नेतृत्वकर्ताओं ने अपनी जिम्मेदारी और भूमिका का सही निर्वहन नहीं किया, जिसके कारण बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का हनन हुआ।
### विशेष अदालत के गठन की सिफारिश, हो सकती है जेल और जुर्माना
आयोग द्वारा सार्वजनिक किए गए प्रतिवेदन के संक्षिप्त अंश के अनुसार, मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई के लिए जो कानूनी प्रावधान हैं, उनके तहत दोषियों को निम्नलिखित सजाएं हो सकती हैं:
* **कैद की अवधि:** दोषी पाए जाने पर अधिकतम 6 महीने की जेल का प्रावधान है।
* **आर्थिक दंड:** इसके अंतर्गत ₹3,00,000 (तीन लाख रुपये) तक के जुर्माने का भी प्रावधान है।
* **सजा का स्वरूप:** यह दोनों सजाएं (जेल और जुर्माना) अलग-अलग या अपराध की गंभीरता के आधार पर एक साथ भी दी जा सकती हैं।
मामले की संवेदनशीलता और इसमें शामिल हाई-प्रोफाइल चेहरों को देखते हुए, नेपाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार से इस पूरे प्रकरण की त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के लिए एक **विशेष अदालत** का गठन करने की भी जोरदार सिफारिश की है।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद से नेपाल की राजनीति में हड़कंप मच गया है, और अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नेपाल सरकार आयोग की इन सिफारिशों पर क्या कदम उठाती है।