वर्तमान भाजपा शासन पर सामाजिक सौहार्द बिगड़ने , ख़राब आर्थिक स्थिति और विश्व पटल पर भारत के घटते प्रभाव पर बढ़ते सवाल
NIZAM ANSARI
आज बांसी नगरपालिका के नरकटहा में आयोजित पी डी ए चौपाल कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष इदरीस पटवारी ने कार्यकर्ताओं और जनता की बीच भा ज पा शासन कि गलत नीतियों पर करारा प्रहार करते हुवे कहा देश में पिछले एक दशक से भाजपा सरकार का शासन है, लेकिन इन वर्षों में कई ऐसे मोर्चे हैं जहां सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
चाहे वह सामाजिक सौहार्द हो, आर्थिक स्थिरता हो, या फिर विदेश नीति और भारत की वैश्विक साख—हर क्षेत्र में सरकार के फैसले और नीतियां आलोचना के घेरे में हैं।
देश में धार्मिक ध्रुवीकरण और सामाजिक विभाजन तेजी से बढ़ा है। चुनावी लाभ के लिए समाज में धार्मिक और जातीय आधार पर दरारें गहरी की जा रही हैं। मॉब लिंचिंग, हेट स्पीच , चुनाव में हेरा फेरी और बहुसंख्यकवादी नीतियों के कारण देश में एक असहज माहौल बनता जा रहा है। अल्पसंख्यकों में भय का माहौल है, और सामाजिक समरसता कमजोर होती जा रही है।
सरकार ने कई बार दावा किया कि वह “सबका साथ, सबका विकास” की नीति पर काम कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आती है। संविधानिक संस्थानों को कमजोर किया जा रहा है, मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, और न्यायपालिका पर भी सरकार के प्रभाव की चर्चाएं आम हो गई हैं।
देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन हकीकत यह है कि बेरोजगारी दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग लगातार महंगाई और टैक्स के बोझ से दबते जा रहे हैं। नोटबंदी और जल्दबाजी में लागू किए गए जीएसटी ने छोटे कारोबारियों को गहरा झटका दिया, जिसका असर आज भी देखा जा सकता है। दिल्ली, बम्बई , कलकत्ता , मद्रास , हैदराबाद , बंगलोर अआदिमें लाखों कारखाने बंद हो गए |
महंगाई की बात करें तो ईंधन, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। सरकार के समर्थकों का कहना है कि वैश्विक परिस्थितियों का असर है, लेकिन सच्चाई यह है कि आर्थिक नीतियों में दूरदर्शिता की कमी और कॉरपोरेट केंद्रित विकास मॉडल के चलते गरीब और मध्यम वर्ग की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
कभी ‘विश्वगुरु’ बनने का डंका बजने का दावा करने वाले भारत का आज वैश्विक मंच पर संघर्ष करता नजर आ रहा है। ब्रिक्स, सार्क और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की भूमिका कमजोर होती जा रही है। चीन के साथ सीमा विवाद पर सरकार की चुप्पी और पड़ोसी देशों के साथ बढ़ता तनाव भारत की विफल विदेश नीति का संकेत है।
पहले भारत गुटनिरपेक्ष नीति पर चलकर वैश्विक राजनीति में एक संतुलित भूमिका निभाता था, लेकिन वर्तमान सरकार की रणनीति कहीं न कहीं एकतरफा झुकाव दर्शा रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजराइल-फलस्तीन संकट, भारत की कूटनीति पहले जैसी प्रभावी नजर नहीं आती।
देश की सबसे मालदार पार्टी भाजपा सरकार ने पिछले कुछ सालों में बड़े-बड़े नारों और प्रचार अभियानों के जरिए अपनी छवि को मजबूत बनाए रखा, लेकिन जनता के लिए असली सवाल ये है कि क्या उनकी जिंदगी में वाकई कोई बदलाव आया? क्या महंगाई कम हुई? क्या रोजगार के अवसर बढ़े? क्या समाज पहले से ज्यादा सुरक्षित और एकजुट महसूस करता है?
अगर इन सवालों के जवाब नकारात्मक हैं, तो यह सरकार के लिए एक चेतावनी है कि सिर्फ चुनावी रणनीति और प्रचार से शासन नहीं किया जा सकता। भारत को एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो वास्तव में सामाजिक समरसता, आर्थिक स्थिरता और मजबूत विदेश नीति पर ध्यान दे—न कि सिर्फ चुनावी लाभ के लिए देश को बांटने की राजनीति करे।
चौपाल के दौरान मोहम्मद इद्रीश पटवारी , कपिल देव, सब्बू खान, पवन कुमार यादव, बुधीराम, सन्नू खान, मैनू,पवन कुमार यादव,दिल्लू,गोलू मेकरानी ,मुन्ना पांडे,सारिक ख़ान,अलीम ख़ान,अज़हर ख़ान, सृताजलि ,सालिक, निवास यादव, प्रहलाद ,साकिर, सिरताज अली , राम निवास ,गणेश दत्ता ,अलीम ख़ान के०सी०त्रिपाठी ,मैनु ,मूवीन ख़ान सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे |