📅 Published on: March 26, 2025
Kapilvastupost
मोहाना बाजार (सिद्धार्थनगर): स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और ईमानदारी का दावा करने वाला प्रशासन खुद ही भ्रष्टाचार की जड़ बनता जा रहा है। मोहाना बाजार स्थित लाईफ अल्ट्रासाउंड सेंटर का सच सामने आने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इसे बचाने में जुटे हैं।
फर्जी डॉक्टर, फर्जी संचालन, लेकिन प्रशासन मौन!
जांच में साफ हो चुका है कि जिस डॉ. डी. के. के नाम से अल्ट्रासाउंड सेंटर पंजीकृत है, वहां असल में एक महिला इसे ऑपरेट कर रही है। यह मेडिकल नियमों का खुला उल्लंघन है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत के चलते इस सेंटर को खुली छूट मिली हुई है।
विडियो फुटेज में साफ देखा गया कि अल्ट्रासाउंड सेंटर में डॉक्टर डी. के. का नाम लिखा है, लेकिन अल्ट्रासाउंड एक महिला संचालित कर रही है। इस खुलासे के बाद भी मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने सिर्फ एक दिखावटी जांच के आदेश दिए। जांच का जिम्मा पीसीपीएनडीटी नोडल अधिकारी डॉ. प्रसांत मौर्या को सौंपा गया, लेकिन उन्होंने सिर्फ कोरम पूरा करते हुए एक हल्का-फुल्का नोटिस जारी कर मामले को रफा-दफा कर दिया।
स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों का सिंडिकेट
अब सवाल उठता है कि जब मामला साफ था, तो डॉ. प्रसांत मौर्या ने सिर्फ नोटिस देकर क्यों छोड़ दिया? क्यों नहीं इस फर्जी सेंटर को सील किया गया? क्यों नहीं एफआईआर दर्ज कराई गई?
इतना ही नहीं, इस खेल में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) बर्डपुर के अधीक्षक डॉ. सुबोध चंद्र की भी अहम भूमिका सामने आ रही है। स्थानीय सूत्रों की मानें तो जांच के नाम पर सिर्फ फाइलों में कार्रवाई दिखाकर मामले को दबा दिया गया। यह पूरी तरह से फर्जी अल्ट्रासाउंड सेंटरों को बचाने का खेल है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्ट अधिकारी खुद शामिल हैं।
जिलाधिकारी के आदेश भी ठंडे बस्ते में!
फर्जी अल्ट्रासाउंड, पैथोलॉजी और अस्पतालों पर लगाम लगाने के लिए जिलाधिकारीसिद्धार्थनगर ने तहसील स्तर पर जांच समितियां बनाई थीं। आदेश था कि हर CHC/PHC अधीक्षक महीने में दो बार ऐसे सेंटरों का निरीक्षण करेंगे और फर्जी संचालन पर तत्काल कार्रवाई करेंगे।
लेकिन सवाल उठता है कि जब मामला सामने आया, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्यों नोडल अधिकारी ने जांच का नाटक किया और मामले को हल्के में लिया? क्या यह दिखाता नहीं कि स्वास्थ्य विभाग में फर्जी अल्ट्रासाउंड और अस्पताल चलाने वाले सिंडिकेट को संरक्षण दिया जा रहा है?
अब जिलाधिकारी को सख्त कार्रवाई करनी होगी
इस मामले ने साफ कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी मेडिकल सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं। अगर फर्जी अस्पताल और अल्ट्रासाउंड सेंटर बंद करने हैं, तो सिर्फ दिखावटी जांच नहीं, बल्कि इन अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी।
डॉ. प्रसांत मौर्या की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
डॉ. सुबोध चंद्र समेत अन्य जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
फर्जी अल्ट्रासाउंड सेंटर को तत्काल सील किया जाए और संचालक पर कानूनी कार्रवाई हो।
अगर प्रशासन इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाता, तो साफ हो जाएगा कि भ्रष्टाचार का यह खेल ऊपर तक फैला हुआ है। क्या जिलाधिकारी स्वास्थ्य विभाग के इस गंदे खेल पर रोक लगाएंगे, या फिर यह मामला भी दबा दिया जाएगा?
अब जनता देख रही है कि प्रशासन वास्तव में कानून लागू करता है या फिर सिर्फ दिखावे की कार्रवाई करता है! और ऐसे अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर जनता के साथ कब तक धोखा होता रहेगा।