📅 Published on: June 11, 2025
गुरु जी की कलम से
बढ़नी सिद्धार्थ नगर
21वीं सदी की चकाचौंध में जब नेता, जनसेवक, दलाल और ठेकेदार सब एक जैसे कपड़े पहनकर एक जैसी गाड़ियों में घूमने लगें, तब आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि सामने वाला कौन है।
लेकिन बढ़नी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की दीवारों ने यह तय कर लिया है—
“दलालों का प्रवेश वर्जित है।”
दरअसल, शोहरतगढ़ विधायक विनय वर्मा द्वारा मुख्य चिकित्साधिकारी को भेजी गई एक शिकायती चिट्ठी के बाद पीएचसी बढ़नी की दीवारों पर यह “क्रांतिकारी” वाक्य अंकित कर दिया गया। आरोप था कि कुछ लोग मरीजों को अस्पताल की दवाओं की जगह बाहर की महंगी दवाएं दिलवाने की साजिश कर रहे हैं। विधायक के हस्तक्षेप के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और अस्पताल पर “दलालों का प्रवेश वर्जित है” लिखवा दिया गया।
लेकिन अब असली सवाल यह है कि दलाल कौन है?
क्या दलालों की कोई यूनिफॉर्म होती है?
जनता का सवाल है कि जब बोर्ड लगा ही दिया गया है, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि दलाल की परिभाषा क्या है?
क्या दलाल के पास कोई पहचान पत्र होता है?
क्या वह सफेद कपड़े पहनता है या नेता जैसा दिखता है?
क्या वह बिना काम के अधिकारियों के आसपास मंडराता रहता है?
जनता का यह भी कहना है कि जब तक अस्पताल के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर जांच न हो, तब तक केवल दीवार की इबारत से दलाली नहीं रुकेगी। सवाल यह भी है कि जब शासनादेश के अनुसार अस्पताल से 100-200 मीटर दूर तक ही दवा दुकानें होनी चाहिए, तो फिर अस्पताल की दीवार से सटकर आधा दर्जन मेडिकल स्टोर क्यों चल रहे हैं? क्या ये दुकानों के पीछे भी कोई अदृश्य दलाल तंत्र है?
दलालों की खोज में उलझा प्रशासन
बढ़नी अस्पताल ही नहीं, ढेबरूआ थाने पर भी ऐसा ही बोर्ड लगाया गया है। लेकिन हर बोर्ड के नीचे वही सवाल उभरता है—”दलाल कौन?”
कुछ लोगों का कहना है कि नेतागिरी की आड़ में घूमने वाले कुछ सफेदपोश, जो कार्यालयों में बिना काम के बैठे रहते हैं, वही असल में “दलाल” हैं। ये वही लोग हैं जो आम लोगों को चक्कर कटवाते हैं, सेटिंग करवाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं।
कानून से हटकर अगर कोई काम हो रहा है…
…तो वहां किसी न किसी दलाल की भूमिका जरूर होती है।
एक जागरूक नागरिक ने कहा – “जो काम नियम से नहीं, बल्कि ‘जुगाड़’ से हो, वहां समझ लीजिए कोई न कोई दलाल बीच में है।”
निष्कर्ष:
बोर्ड तो लग गया, पर जवाब कौन देगा?
अगर सच में दलाली को रोकना है, तो अस्पताल के अंदर और बाहर दोनों की साफ-साफ जांच जरूरी है। वरना “दलाल प्रवेश वर्जित” सिर्फ एक दीवार की साज-सज्जा बनकर रह जाएगा।
बड़ा सवाल
समाप्त नहीं, सवाल बाकी है:
क्या अगली बार कोई सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि आगे आकर यह बताएंगे कि दलाल की पहचान कैसे करें?
या फिर यह काम भी किसी दलाल को ही सौंप दिया जाएगा?