नेपाल में फिर से अंतरिम सरकार: चुनौतियाँ एक दशक तक चला है अंतरिम सरकारों का दौर 

परमात्मा प्रसाद उपाध्याय

नेपाल एक बार फिर एक नई अंतरिम सरकार के अधीन आ गया है, जिसका नेतृत्व सुशीला कार्की कर रही हैं। यह घटनाक्रम देश के एक लंबे और अस्थिर राजनीतिक सफर का हिस्सा है, जिसने वर्षों तक लोकतंत्र और राजशाही के बीच संघर्ष देखा है। 1996 से 2006 तक चले गृह-युद्ध और व्यापक जन आंदोलन के बाद, 2006 में राजा ज्ञानेंद्र को सत्ता जनता को सौंपनी पड़ी थी।

संविधान निर्माण की लंबी कहानी

2007 में नेपाल में अंतरिम संविधान लागू हुआ, जिसके तहत एक संविधान सभा का चुनाव होना था। 2008 में चुनाव हुए, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच संघीय ढांचा, धर्मनिरपेक्षता और जातीय प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर असहमति के कारण संविधान बनाने की प्रक्रिया लंबी खिंच गई। संविधान सभा की समय सीमा कई बार बढ़ाई गई और इस दौरान कई अंतरिम सरकारें आईं और गईं, जिनमें माओवादी नेता प्रचंड, माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल और बाबूराम भट्टाराई ने देश का नेतृत्व किया।

आखिरकार, 2015 में आए विनाशकारी भूकंप ने राजनीतिक दलों को एकजुट होने पर मजबूर किया। इसके परिणामस्वरूप, 20 सितंबर 2015 को नेपाल में नया संविधान लागू हुआ। इस तरह नेपाल में लगभग नौ वर्षों तक अंतरिम सरकारें सत्ता में रहीं।

अंतरिम सरकार: उद्देश्य और चुनौतियाँ

अंतरिम सरकारें आमतौर पर राजनीतिक अस्थिरता, शासन परिवर्तन या नए संविधान के निर्माण जैसी असाधारण परिस्थितियों में बनती हैं। इनका मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक बदलाव को सुचारू बनाना, स्थायी सरकार बनने तक प्रशासन चलाना और आवश्यक राजनीतिक सहमति कायम करना होता है। आदर्श रूप से, इनकी अवधि संक्षिप्त होती है, लेकिन कई बार यह राजनीतिक असहमति और संघर्ष के कारण लंबी खिंच जाती है, जैसा कि नेपाल, कंबोडिया, दक्षिण अफ्रीका, इराक और बांग्लादेश में देखा गया है।

  • कंबोडिया: पेरिस शांति समझौते (1991) के बाद, संयुक्त राष्ट्र के संरक्षण में बनी अंतरिम सरकार ने दो साल बाद 1993 में चुनाव कराए।

  • दक्षिण अफ्रीका: रंगभेद की समाप्ति के बाद, नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने दो साल में नया संविधान बनाया और 1996 में स्थायी सरकार बनी।

  • इराक: सद्दाम हुसैन के पतन के बाद, अंतरिम प्रशासन लगभग दो साल तक चला, जिसके बाद 2005 में नया संविधान लागू हुआ।

  • बांग्लादेश: हाल ही में, युवाओं के आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार समाप्त हो गई और अब मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चल रही है, जबकि राजनीतिक दल लगातार चुनाव की मांग कर रहे हैं।

नेपाल के लिए आगे की राह

नेपाल की नई अंतरिम सरकार के सामने कई चुनौतियाँ हैं। आंदोलनकारियों ने देश की कई महत्वपूर्ण इमारतों को जला दिया है, जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। इस सरकार की मुख्य जिम्मेदारी है कि वह जल्द से जल्द देश में सामान्य स्थिति बहाल करे और चुनाव कराए। किसी भी अंतरिम सरकार की सफलता उसकी अवधि की संक्षिप्तता, पारदर्शिता और राजनीतिक दलों के बीच बनी सहमति पर निर्भर करती है। लंबी अवधि की अंतरिम सरकारें जनता का विश्वास कम करती हैं, विकास को बाधित करती हैं और विदेशी निवेश को हतोत्साहित करती हैं।

यह भी देखना बाकी है कि सुशीला कार्की के नेतृत्व में यह अंतरिम सरकार नेपाल को जल्द से जल्द राजनीतिक स्थिरता की ओर ले जा पाएगी या नहीं। क्या यह सरकार देश को सामान्य स्थिति में ला पाएगी और चुनाव कराकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरा कर पाएगी?