​सिद्धार्थनगर में भारत-नेपाल मैत्री का उत्सव: सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मिला नया आयाम

​निजाम अंसारी

सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में भारत और नेपाल के अटूट रिश्तों की मिठास और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन के साझा प्रयास से आयोजित दो दिवसीय ‘भारत-नेपाल मैत्री महोत्सव’ का बुधवार को भव्य शुभारंभ हुआ। इस आयोजन ने न केवल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को याद किया, बल्कि भविष्य की मित्रता को एक नया आयाम भी दिया।

भव्य शोभायात्रा से हुआ महोत्सव का श्रीगणेश

​महोत्सव की शुरुआत एक रंगारंग शोभायात्रा के साथ हुई, जिसने पूरे शहर को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया। इस यात्रा में फारूवाही और बधावा लोक नृत्य के कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। स्काउट एंड गाइड के छात्र-छात्राओं के उत्साह ने इस मार्च को और भी जीवंत बना दिया।

“रोटी-बेटी का है पवित्र रिश्ता” 

​कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, सांसद प्रतिनिधि एस.पी. अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। अपने संबोधन में उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि

भारत और नेपाल का संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रोटी-बेटी का पवित्र रिश्ता है। जहाँ नेपाल भगवान बुद्ध की जन्मस्थली है, वहीं भारत उनकी कर्मस्थली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह संबंध 2014 के बाद से और भी प्रगाढ़ हुए हैं।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन

​महोत्सव के पहले दिन भारतीय और नेपाली कलाकारों ने लोकगायन, सूफी संगीत और शास्त्रीय नृत्य की ऐसी छटा बिखेरी कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। कलाकार विशाल श्रीवास्तव के राष्ट्रभक्ति गीतों, विशेषकर “हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए”, ने पंडाल में मौजूद हर व्यक्ति के भीतर देशभक्ति का जोश भर दिया।

आज (19 फरवरी) के आकर्षण: मिनी भारत की दिखेगी झलक

​महोत्सव का दूसरा दिन और भी खास होने वाला है। आज 19 फरवरी को देश के विभिन्न कोनों से आए कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे:

विविध राज्य: मध्य प्रदेश, लखनऊ, सीतापुर, प्रयागराज और संत कबीर नगर के कलाकारों का जमावड़ा लगेगा।

विशेष आकर्षण: अवधी लोक गायन, नुक्कड़ नाटक और भारत-नेपाल मैत्री पर आधारित विशेष समूह नृत्य।

​यह महोत्सव न केवल पर्यटन को बढ़ावा देने का एक मंच बना है, बल्कि यह सीमावर्ती क्षेत्रों में साझा सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की एक सराहनीय पहल भी है।