कुंठा और ईर्ष्या: समाज की प्रगति में बाधक दो ‘अदृश्य दुश्मन’

Kapilvastupost
आज के प्रतिस्पर्धी युग में जहाँ हर कोई सफलता की दौड़ में शामिल है, वहीं समाज में कुंठित (Frustrated) और हसदी (Jealous) प्रवृत्तियों का प्रसार एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक जानकारों का मानना है कि ये दो मानसिक स्थितियाँ न केवल व्यक्ति को अंदर से खोखला करती हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक ‘अदृश्य बोझ’ साबित हो रही हैं।

कुंठा (Frustration): असफलताओं से जन्मी नकारात्मकता
कुंठा तब पैदा होती है जब व्यक्ति अपनी असफलताओं को स्वीकार करने के बजाय उनसे हार मान लेता है। एक कुंठित व्यक्ति की पहचान उसके चिड़चिड़ेपन और नकारात्मक दृष्टिकोण से होती है। वह अपनी कमियों को सुधारने के बजाय दूसरों की प्रगति को अपनी हार मानने लगता है। ऐसे व्यक्ति के पास बैठने पर ऊर्जा का संचार होने के बजाय निराशा का अनुभव होता है।
हसद (Jealousy): मुस्कुराहट के पीछे छिपा जहर
ईर्ष्या या हसद को एक ‘मानसिक बीमारी’ की संज्ञा दी गई है। हसदी व्यक्ति की विडंबना यह है कि वह अपनी खुशियों से उतना खुश नहीं होता, जितना दूसरों के दुख या विफलता को देखकर सुकून पाता है।
* दोहरा चरित्र: सामने प्रशंसा करना और पीठ पीछे अफवाहें फैलाना।
* लक्ष्य: दूसरे की सफलता को छोटा या अनैतिक साबित करने की कोशिश करना।
आत्म-विनाशकारी परिणाम
इन प्रवृत्तियों का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका शिकार व्यक्ति स्वयं सबसे ज्यादा पीड़ित होता है।
* सामाजिक अलगाव: समाज धीरे-धीरे ऐसे लोगों से दूरी बनाने लगता है, जिससे वे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं।
* मानसिक विकार: लगातार जलने और कुढ़ने से उच्च रक्तचाप और मानसिक तनाव जैसी बीमारियाँ जन्म लेती हैं।
* विकास की समाप्ति: जब सारा ध्यान दूसरों को नीचे गिराने पर हो, तो खुद के विकास के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।
निष्कर्ष: समाज को यदि स्वस्थ बनाना है, तो हमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना होगा और दूसरों की सफलता का सम्मान करना सीखना होगा। याद रखें, दूसरे का दीया बुझाने से आपके घर में उजाला नहीं हो सकता।