सिद्धार्थ नगर – न्याय तो मिला, पर बिखरी उम्मीदों के साथ , 42 साल का अंतहीन इंतजार: पुलिस की लचर कार्यशैली और झूठी FIR ने ली दो की जान, 79 की उम्र में मिला इंसाफ

गुरु जी की कलम से

सिद्धार्थनगर। न्याय में देरी खुद में एक अन्याय है—यह कहावत सिद्धार्थनगर जिले के एक मामले पर पूरी तरह सटीक बैठती है। जिस उम्र में इंसान जीवन के उत्तरार्ध में आराम और सुकून की उम्मीद करता है, उस उम्र में 79 वर्षीय दयाले यादव कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपनी बेगुनाही साबित करने की जंग लड़ रहे थे। डकैती के जिस आरोप को साबित करने में पुलिस 42 साल तक नाकाम रही, उस झूठी FIR और जांच के चक्रव्यूह ने तीन में से दो आरोपियों की जिंदगी ही छीन ली।

अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम मोहम्मद रफी की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में दयाले यादव को बाइज्जत बरी तो कर दिया, लेकिन इस फैसले ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली, एफआईआर (FIR) दर्ज करने की जल्दबाजी और ढुलमुल जांच व्यवस्था पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या था मामला? 1984 से 2026 तक की न्याय यात्रा

घटना 18 नवंबर 1984 की है, जब इटवा थाना क्षेत्र (तब बस्ती जिले का हिस्सा) के सेखुई खुर्द गांव निवासी राम प्रताप यादव के घर डकैती पड़ी थी। श्यामलाल यादव की तहरीर पर पुलिस ने धारा 395 और 397 (डकैती) के तहत केस दर्ज किया।

पुलिस ने आनन-फानन में तीन लोगों को नामजद/गिरफ्तार किया:

  • दयाले यादव (तत्कालीन उम्र: 37 वर्ष)

  • सुमिरन यादव (निवासी: पेंदा)

  • झिन्नू यादव (निवासी: खोरिया रघूबीर सिंह)

मामला बस्ती कोर्ट से शुरू हुआ और 1988 में सिद्धार्थनगर जिला बनने के बाद यहां स्थानांतरित हो गया। चार दशकों तक चले इस मुकदमे के दौरान वकीलों की पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन न्याय का इंतजार खत्म नहीं हुआ। इस लंबे दौर में सुमिरन यादव और झिन्नू यादव बिना इंसाफ देखे ही दुनिया से रुखसत हो गए।

पुलिस की कार्यशैली और एफआईआर पर सवाल

यह मामला सिर्फ एक फैसले की कहानी नहीं है, बल्कि पुलिसिया व्यवस्था और आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) की नाकामियों का एक कच्चा चिट्ठा है:

1. बिना ठोस साक्ष्य के गिरफ्तारी और कमजोर एफआईआर

पुलिस ने 1984 में एफआईआर दर्ज कर आरोपियों को सलाखों के पीछे तो भेज दिया, लेकिन 42 साल बीत जाने के बाद भी अदालत के समक्ष एक भी ठोस साक्ष्य या गवाह पेश नहीं कर सकी। सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस का काम महज धाराएं लगाकर खानापूर्ति करना और आंकड़े पूरे करना है?

2. जांच की घटिया गुणवत्ता और मॉनिटरिंग का अभाव

चार दशकों तक चले इस केस में पुलिस विवेचना (Investigation) का स्तर इतना कमजोर रहा कि साक्ष्यों का कोई आधार ही नहीं बचा। अगर आरोप में जरा भी सत्यता नहीं थी, तो किस आधार पर तीन लोगों का जीवन इस मुकदमे की आग में झोंक दिया गया?

3. ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ का जीता-जागता उदाहरण

दयाले यादव जब गिरफ्तार हुए थे, तब वे 37 साल के एक मजबूत युवा थे। आज जब वे बरी हुए हैं, तो उनकी उम्र 79 साल हो चुकी है—कमर झुक चुकी है, चेहरे पर झुर्रियां हैं और कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ते वक्त सांस फूलती है। जो 42 साल उनसे छीने गए, उसकी भरपाई कौन करेगा?

न्याय तो मिला, पर बिखरी उम्मीदों के साथ

अदालत का फैसला आते ही दयाले यादव की आंखें छलक पड़ीं। चेहरे पर सुकून तो था, लेकिन साथ ही उन दो साथियों (सुमिरन और झिन्नू) का गम भी था जो अपने माथे से डकैत का कलंक मिटने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह गए।

यह मामला इस बात की सख्त चेतावनी है कि जब तक पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार, जवाबदेही तय करने की व्यवस्था और एफआईआर दर्ज करने से लेकर साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं आएगी, तब तक न जाने कितने दयाले यादव अपनी बेगुनाही साबित करने में अपनी पूरी जिंदगी गंवाते रहेंगे।