📅 Published on: May 11, 2024
डुमरियागंज लोकसभा क्षेत्र की सत्तर फीसदी आबादी गरीब है जिसे सरकारी अस्पतालों में एक्स रे , अल्ट्रा साउंड , सी टी स्कैन के साथ ही डॉक्टरों की उपलब्धता के साथ ही बेहतर सुविधा की दरकार है |
वहीं लोकसभा क्षेत्र में सरकारी स्कूलों में अच्छी पढाई चाहता है रोजगार की चाहत रखता है लेकिन जब वोट देने जाता है वह भटक जाता है यह बड़ा सवाल है आम आदमी सरकार से व्यवस्था चाहता तो है लेकिन सरकार चुनते समय वह तय नहीं कर पाता और यहीं से उसका पतन सुरु हो जाता है |
kapilvastupost
डुमरियागंज संसदीय सीट पर लोकसभा चुनाव की विसात बिछ चुकी है। आधा दर्जन उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दिया है। सब अपने-अपने वायदों से जनता का रहनुमा बनने की कोशिश में जी-जान से जुटे गये है, मगर इन नेताओं की नजर क्या इस बार जनता से जुड़े मुददों पर है।
इस जिले के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी और पलायन वह अहम मुददे हैं, जिनको इस चुनाव में जनता मुददा बनाना चाह रही है, मगर यह मुददे नेताओं के नजर में गौर बने हुए हैं।
मालूम हो कि डुमरियागंज सीट पर मतदाताओं की संख्या 19 लाख से अधिक है। इनका मत पाने के लिए इस क्षेत्र से भाजपा के जगदम्बिका पाल, इंडिया गठबंधन से भीष्म शंकर त्रिपाठी उर्फ कुशल तिवारी, बसपा की ओर से मु. नदीम, आसपा से
अमर सिंह, पीस पार्टी से नौशाद आजम एवं निर्दल किरन देवी चुनावी संग्राम में एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए ताल ठोंक रहे हैं।
सभी प्रत्याशी जनता को लुभाने के लिए अपने- अपने दांव आजमा रहे हैं। कोई बाहरी बनाम स्थानीय का मुददा उछाल कर मत हासिल करने का प्रयास कर रहा है तो कोई केन्द्र सरकार की उपलब्धियों को गिना रहा है।
कई प्रत्याशी निवर्तमान सांसद की नाकामियों को गिनाकर जनता का हितैषी बनाना चाह रहा है, लेकिन इन दावेदारों के बीच जनता से जुडे मुददे गायब है। जनपद सृजन को तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका है, मगर यह जनपद आज भी प्रदेश के अति पिछड़े जिलों में शुमार है।
रोजगार के लिए यहां पर एक भी उद्योग ऐसा नहीं है, जिससे जिले के 100-50 युवाओं को रोजगार मुहैया हो सके। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज भी जिले में विकल्प मौजूद नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आज भी गंभीर रोगों के इलाज के लिए लोगों को लखनऊ और दिल्ली का ही सहारा लेना पड़ता है।
हर चुनाव में उम्मीदवार जनता को इन समस्याओं से छुटकारें का वायदा कर उनका वोट हासिल करते है, और फिर पांच साल तक इन मुददों को भुला दिया जाता है। यह कार्य पिछले तीन दशक से जारी है।
अब जनता के पास एक ही विकल्प है कि वह अपने अधिकारों के लिए शिक्षा , स्वस्थ्य और रोजगार पर सरकार से सवाल करें उनके कार्यकाल की उपलब्धियों का हिसाब ले | सरकारों को बदल बदल कर देखे जो सरकार उसको सरकारी अस्पतालों में आपरेसन की सुविधा , अच्छी और सस्ती शिक्षा और रोजगार देने वाले उद्द्योगों की स्थापना करे वोट उसी देगा तो ही जनता का भला हो पायेगा |